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ⓘ लोद्र्वा का प्राचीन इतिहास. देवरावल की दक्षिण सीमा में लोद्र् राजपूत निवास करते थे | उनकी राजधानी का नाम लुद्रवा था और वह नगरी जिस भांति विस्तार वाली थी उसी भां ..



                                     

ⓘ लोद्र्वा का प्राचीन इतिहास

देवरावल की दक्षिण सीमा में लोद्र् राजपूत निवास करते थे | उनकी राजधानी का नाम लुद्रवा था और वह नगरी जिस भांति विस्तार वाली थी उसी भांति उसमे जाने के लिए बारह बड़े बड़े दरवाजे थे | राजा नृपभानु धार्मिक प्रवर्ती के थे, उन्होंने यहाँ पर काक नदी के किनारे चारमुखी श्री लोधेश्वर महादेव की प्राण प्रतिस्ठा की थी | लुद्रवा के राजपुरोहित ने किसी कारण वश राजा से विवाद कर अंत में देवराज के पास जाकर आश्रय लिया और वह लुद्र्वा के राजा को सिहासन से अलग करके उक्त राज्य को अपने अधिकार में करने के लिए देवराज को सम्मति देने लगा | देवराज ने राजपुरोहित की सम्मति के अनुसार लुद्र्वा के राजा नृपभानु के पास यह संदेस भेजा की, मैं आपकी कन्या के साथ विवाह करने की अभिलाषा करता हूँ | राजा नृपभानु ने देवराज को अपनी कन्या देने में महागोरव समझा और सीघ्र ही उनके प्रस्ताव को स्वीकाकर लिया | राजा नृपभानु ने शादी के सभी इंतजाम पुरे कर लिए | देवराज कुटिल नीति अपना कर बारह सौ असीम साहसी अश्वरोही सेना लेकर वर के भेष में बारात सहित लुद्रवा राजधानी आ पंहुचा | राजा नृपभानु ने बारात के स्वागत के लिए नगर के गेट खोल दिए | परन्तु विश्वासघाती देवराज ने नगर में प्रवेश करते ही युद्ध आरम्भ कर दिए | इस भयंकर युद्ध में राजा नृपभानु बलिदान हो गये और लुद्रवा राज्य पर देवराज ने कब्ज़ा कर लिया तथा लुद्रवा के सिहासन पर विराजमान हुआ | तथा राजा नृपभानु की कन्या के साथ विवाह करके देवरावल लौट आया और लुद्रवा ने यादवों की सेना का एक दल वहा पर तैनात कर दिया | इससे पूर्व एक समय में पंवार वा परमार जाती भारतवर्ष में सबसे पहले मरूक्षेत्र की अधीस्वर थी परमार वंश की प्रसिद शाखा लोद्र राजपूत जिसका अपभ्रंश लोधी राजपूत, लोधा, लोध, लोधे राजपूत अपना सम्मान के जीवन जीने के लिए वहाँ से पलायन कर दूर दराज के क्षेत्रो में चले गये | वर्तमान में इस जाती का मुख्या व्यवसाय कृषि हे तथा उत्तर प्रदेश वा मध्यप्रदेश में इस जाती का राजनैतिक स्थिती काफी मजबूत मानी जाती हैं | उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री व राजस्थान के महामहिम राज्यपाल माननीय श्री कल्याण सिंह लोधी व मध्याप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व केंद्रीयमंत्री सुश्री साध्वी उमा भारती इसी वंस लोधी जाती से सम्बन्ध रखते हैं |

लोद्रवा-

लौद्रवा राजस्थान के जैसलमेर शहर से 15 कि.मी.

दूर स्थित एक ऐतिहासिक स्थान है। मध्यकालीन मंदिरों

के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। लौद्रवा को भट्टी

राजवंश की राजधानी होने का गौरव प्राप्त

है। यहाँ के भग्नावशेषों में जैन धर्मावलम्बियों ने कुछ धार्मिक

स्थलों का जीर्णोद्धार करवाया था। इसके फलस्वरूप

लौद्रवा जैन सम्प्रदाय का प्रमुख तीर्थ स्थल बन

गया।

स्थिति तथा इतिहास

जैसलमेर से 15 कि.मी. दूर काक नदी के

किनारे बसा लोद्रवा ग्राम व यहां के कलात्मक जैन मंदिर तो देखते

ही बनते हैं। ऐसा माना जाता है कि लोद्रवा ग्राम को

लोद्रवावर्तमान लोध राजपूत व रोद्रवा नामक राजपूत जातियों ने बसाया था।

प्राचीन काल में लोद्रवा अत्यन्त ही हरा-

भरा कृषि क्षेत्र था। लोद्रवा एक सुन्दर स्थान तो था

ही, इसके साथ-साथ यहां के लोग भी

समृद्ध थे।

ग़ोरी द्वारा आक्रमण

बारहवीं शताब्दी में जब मुहम्मद

ग़ोरी ने भारत के मंदिरों को लूटना व नष्ट करना शुरू किया

तो यह शहर भी उसकी नजरों से बच न

सका। उस समय इस नगर के शासक भुजदेव थे। मुहम्मद

ग़ोरी के भयानक आक्रमण के दौरान भुजदेव

भी युद्ध में मारे गए थे व यहां के जैन मंदिर

भी आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिए थे।

मंदिरों का पुनर्निर्माण

बाद में कुछ वर्षों के पश्चात् यहां के पांचों जैन मंदिरों का

पुनर्निर्माण घी का व्यापार करने वाले थारुशाह ने विक्रम

संवत 1675 में करवाया। इन मंदिरों के निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों

को सोना देकर ख़रीदा गया था। लोद्रवा स्थित जैन मंदिरों

में भगवान पार्श्वनाथ की मूर्ति सफ़ेद संगमरमर से

निर्मित है। मूर्ति के ऊपर सिपर हीरे जड़े हुए हैं,

जिससे मूर्ति अत्यन्त आकर्षक लगती है। मंदिरों को

कलात्मक रूप देने के लिए पत्थर के शिल्पियों ने मंदिरों के स्तंभों व

दीवारों पर देवी-देवताओं की

मूर्तियां उत्कीर्ण कर इसके सौंदर्य को बढ़ाया है। मंदिर

को अधिक गरिमा प्रदान करने के लिए नौवीं-

दसवीं शताब्दी में मंदिर के सम्मुख तोरण

द्वार बनाने की भी परंपरा थी।

मंदिर के समस्त स्तंभों में मुखमंडप के स्तंभों का घट-पल्लव

अलंकरण सर्वाधिक कुशलता एवं सौंदर्य का परिचय देता है।

हालांकि मंदिर की मौलिकता तथा वास्तु योजना को ज्यों का

त्यों रखा गया है। लोद्रवा का जैन मंदिर वास्तुकला एवं मूर्तिकला

की शैली की शताब्दियों

लंबी विकास यात्रा का भी साक्ष्य प्रस्तुत

करता है।

दर्शनीय स्थल

पार्श्वनाथ मंदिर के समीप एक कलात्मक

बनावटी कल्प वृक्ष है, जिसमें चीते,

बकरी, गाय, पक्षी व अनेक जानवरों को

भी एक साथ दर्शाया गया है। कल्प वृक्ष जैन

धर्मावलंबियों के लिए समृद्धि व शांति का द्योतक है। लोद्रवा स्थित

काक नदी के किनारे रेत में दबी भगवान शिव

की अनोखी मूर्ति है, जिसके चार सिर हैं।

यह मूर्ति केवल अर्द्धभाग तक ही दृष्टिगत है।

इसके साथ ही नदी के किनारे पर महेंद्र-

भूमल की प्रेम कहानी को विस्मृत न होने

देने के लिए उनकी याद में एक मेढ़ी

बनी हुई है, जो भूमल की मेढ़ी

के नाम से विख्यात है। लोद्रवा में प्राचीन काल में बने

घर, कुएं, तालाब व कलात्मक स्नान घर के अवशेष देखने को

मिलते हैं, जो अतीत के वैभव को दर्शाते हैं।

अवशेष

लुद्रवा या लोद्रवा कभी भाटी शासकों

की राजधानी रहा था, लेकिन वक़्त

बीता तो एक राजधानी का अस्तित्व समाप्त

हुआ और जैसलमेर के माथे पर मुकुट रखे जाने का पथ प्रशस्त

हुआ। लुद्रवा आज भी अवशेषों को माध्यम बनाकर

अपने प्राचीन वैभव की दास्तान सुनाता है।

साथ ही नए निर्माण के कारण अस्तित्व में आये जैन

मंदिर की बेहद खूबसूरत जालीदार

दीवारें, जिनकी हर एक पंक्ति का शिल्प

भिन्न-भिन्न होने के कारण रचनात्मक कौशल का

बेहतरीन नमूना है, किसी के भी

आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं। इसी

मंदिर का तोरण अपने मूल में प्रयुक्त प्राचीन पत्थरों

को माध्यम बनाकर इस नगर के शैव होने का प्रमाण देता-सा लगता

है।

राव जैसल द्वारा त्रिकूट पर्वत पर जैसलमेर की

नींव रखने के पहले भाटी राजपूतों

की राजधानी लौद्रवा थी जो

जैसलमेर से सत्रह किमी उत्तरपश्चिम में है। आज तो

लौद्रवा की उपस्थिति जैसलमेर से लगे एक गाँव भर

की है। ऐसा माना जाता है कि लोदुर्वा का नाम इसे बसाने

वाले लोदरावर्तमान लोध राजपूत राजपूतों की वजह से पड़ा। दसवीं

शताब्दी में ये इलाका भाटी शासकों के

अधीन आ गया। ग्यारहवीं शताब्दी

में गजनी के आक्रमण ने इस शहर को तहस नहस

कर दिया। प्राचीन राजधानी के अवशेष तो

कालांतर में रेत में विलीन हो गए पर उस काल में बना जैन

मंदिर सत्तर के दशक में अपने जीर्णोद्वार के बाद आज

के लोद्रवा की पहचान है।

जैसलमेर में थार मरुस्थल और सोनार किले को देखने के बाद हमारा

अगला पड़ाव ये जैन मंदिर ही थे। दिन के साढ़े नौ बजे

जब हम अपने होटल से निकले, नवंबर के आख़िरी

हफ्ते की खुशनुमा धूप गहरे नीले आकाश

के सानिध्य में और सुकून पहुँचा रही थी।

जैसलमेर से लोधुर्वा की ओर जाती

दुबली पतली सड़क पर अज़ीब

सी शांति थी। बीस मिनट

की छोटी सी यात्रा ने हमें मंदिर के

प्रांगण में ला कर खड़ा कर दिया था।

जैसलमेर के स्वर्णिम शहर के नाम को साकार करते हुए ये मंदिर

भी सुनहरा रूप लिए हुए हैं। मंदिर के गर्भगृह में जैन

तीर्थांकर पार्श्वनाथ की मूर्ति है। इनके

आलावा इस जैन मंदिर परिसर के हर कोने में अलग

तीर्थांकरों को समर्पित मंदिर हैं।

लोद्रवा के इस मंदिर का एक और आकर्षण है और वो है यहाँ का

कल्पवृक्ष जिसे मंदिर के शिखर पर स्थापित किया गया है

नीचे चित्र में देखें। पुराणों के अनुसार समुद्रमंथन से

प्राप्त 14 रत्नों में कल्पवृक्ष भी था। हिंदुओं

की ये धारणा है कि कल्पवृक्ष से जिस वस्तु

की भी याचना की जाए,

वही यह दे देता है। ख़ैर मंदिर में जाते वक़्त मुझे

कल्पवृक्ष की इस महिमा का पता नहीं था

इसलिए अपनी इच्छित वस्तु प्राप्त करने का ये मौका

भी जाता रहा।

कलात्मकता की दृष्टि से इस मंदिर की गणना

राजस्थान के सबसे सुंदर मंदिरों में होनी चाहिए। मंदिर में

प्रवेश करते ही सबसे पहले नज़र पड़ती

है इसके खूबसूरत तोरण द्वार पर।

                                     
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अनुवाद

प्राचीन भारत का इतिहास नोट्स.

लोद्र्वा का प्राचीन इतिहास. देवरावल की दक्षिण. सागर, बड़ा बाग व छतरियां, लोद्र्वा, साम के रेतीले टीले, वुड फ़ासिक़ पार्क, पोखरण, रामदेवरा, सफारी, राष्ट्रीय मठ उधान, यह संग्राहलय जैसलमेर के प्राचीन गौरव को अपने में समेटे हुए है। यहाँ आप इतिहास सम्बन्धी दस्तावेज़, कठपुतलियां, जैसलमेर की लोक संस्कृति से जुड़ी वस्तुएं, वाध्य यंत्र,. प्राचीन भारत का इतिहास pdf. वास्तु इतिहास. लोद्र्वा का प्राचीन इतिहास. भारत का इतिहास और संस्‍कृति गतिशील है और यह मानव सभ्‍यता की शुरूआत तक जाती है। यह सिंधु घाटी की रहस्‍यमयी संस्‍कृति से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है। भारत के इतिहास में भारत के आस पास स्थित अनेक. भारत का प्राचीन इतिहास. Places to Visit in Jaisalmer Hindi Nativeplanet. यह पुस्तक भारत के प्राचीन इतिहास का एक विस्तृत और सिलेसिलेवार ब्यौरा प्रस्तुत करती है। पुस्तक में इतिहास लेखन के स्वरूप, महत्त्व, स्रोतों पर भी चर्चा की गई है। यह अपने समय काल में सभ्यताओं के उदय और उनकी स्थितियों का विश्लेषण करती है।.


प्राचीन इतिहास कब से कब तक है.

जैसलमेर का राजवंश राजपूतों की चंद्रवंश Bhati. Jain mandir जैसलमेर से 20 किलोमीटर दूर लोद्र्वा में स्तिथ है, इस मंदिर का इतिहास लगभग 1000 वर्ष पुराना है इतिहासकारों की अति प्राचीन है जिसमे भाई अपनी भांजी भांजा की शादी में. भारत का इतिहास हिंदी. Buy Indias Ancient Past भारत का प्राचीन इतिहास Book. हैनिक्स, इटावा सफारी पार्क, द हार्लेकुईन कार्निवल, फूल खिले हैं गुलशन टीवी कार्यक्रम, ऑटो पार्ट्स, कार्डियोलॉजी​,. प्राचीन भारत का इतिहास books. संस्‍कृति और विरासत प्राचीन इतिहास भारत के बारे. बेटी युग में बेटा बेटी, सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे। फौलादी ले नेक इरादे, खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे। देश पढ़ेगा, देश बढ़ेगा, दौड़ेगी अब, तरुण जवानी। बेटी युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी। बेटा शिक्षित, आधी शिक्षा, बेटी शिक्षित पूरी शिक्षा।.


भारत का इतिहास वीडियो.

भारत का 20 लाख साल पुराना इतिहास देखेंगे?. दस लाख वर्ष से अधिक पुराना यह कुल्हाड़ी तमिलनाडु में पाए जाने वाले सबसे प्राचीन पत्थर इस संग्रह में 100 से अधिक कलाकृतियां शामिल हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास के महत्वपूर्ण पड़ावों को दर्शाती हैं. सालों पहले. Blogs बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर कविता Beti Bachao Beti. यदु की डाँग से जबुलिस्तान,गजनी,सम्बलपुर होते हुऐ सिंध के रेगिस्तान में आये और वहां से लंघा,जामडा और मोहिल कौमो को निकाल कर तनौट,देरावल,लोद्र्वा और जैसलमेर को अपनी राजधानी बनाई ।जैसलमेर के इस राजवंश का इतिहास यथाक्रम महाराजा रज.


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