कुष्ठरोग

हिब्रू बाइबिल शब्दावली और इसके विभिन्न अर्थों के लिये, ज़ार्थ Tzaraath देखें. अन्य उपयोगों के लिये कुष्ठरोग स्पष्टीकरण देखें.
कुष्ठरोग या हैन्सेन का रोग, चिकित्सक गेरहार्ड आर्मोर हैन्सेन के नाम पर, माइकोबैक्टेरियम लेप्री और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमेटॉसिस जीवाणुओं के कारण होने वाली एक दीर्घकालिक बीमारी है। कुष्ठरोग मुख्यतः ऊपरी श्वसन तंत्र के श्लेष्म और बाह्य नसों की एक ग्रैन्युलोमा-संबंधी बीमारी है; त्वचा पर घाव इसके प्राथमिक बाह्य संकेत हैं। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो कुष्ठरोग बढ़ सकता है, जिससे त्वचा, नसों, हाथ-पैरों और आंखों में स्थायी क्षति हो सकती है। लोककथाओं के विपरीत, कुष्ठरोग के कारण शरीर के अंग अलग होकर गिरते नहीं, हालांकि इस बीमारी के कारण वे सुन्न तथा/या रोगी बन सकते हैं।
कुष्ठरोग ने 4.000 से भी अधिक वर्षों से मानवता को प्रभावित किया है, और प्राचीन चीन, मिस्और भारत की सभ्यताओं में इसे बहुत अच्छी तरह पहचाना गया है। पुराने येरुशलम शहर के बाहर स्थित एक मकबरे में खोजे गये एक पुरुष के कफन में लिपटे शव के अवशेषों से लिया गया डीएनए DNA दर्शाता है कि वह पहला मनुष्य है, जिसमें कुष्ठरोग की पुष्टि हुई है। 1995 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन डब्ल्यूएचओ WHO के अनुमान के अनुसार कुष्ठरोग के कारण स्थायी रूप से विकलांग हो चुके व्यक्तियों की संख्या 2 से 3 मिलियन के बीच थी। पिछले 20 वर्षों में, पूरे विश्व में 15 मिलियन लोगों को कुष्ठरोग से मुक्त किया जा चुका है। हालांकि, जहां पर्याप्त उपचार उपलब्ध हैं, उन स्थानों में मरीजों का बलपूर्वक संगरोध या पृथक्करण करना अनावश्यक है, लेकिन इसके बावजूद अभी भी पूरे विश्व में भारत जहां आज भी 1.000 से अधिक कुष्ठ-बस्तियां हैं, चीन, रोमानिया, मिस्र, नेपाल, सोमालिया, लाइबेरिया, वियतनाम और जापान जैसे देशों में कुष्ठ-बस्तियां मौजूद हैं। एक समय था, जब कुष्ठरोग को अत्यधिक संक्रामक और यौन-संबंधों के द्वारा संचरित होने वाला माना जाता था और इसका उपचार पारे के द्वारा किया जाता था- जिनमें से सभी धारणाएं सिफिलिस syphilis पर लागू हुईं, जिसका पहली बार वर्णन 1530 में किया गया था। अब ऐसा माना जाता है कि कुष्ठरोग के शुरुआती मामलों से अनेक संभवतः सिफिलिस syphilis के मामले रहे होंगे. अब यह ज्ञात हो चुका है कि कुष्ठरोग न तो यौन-संपर्क के द्वारा संचरित होता है और न ही उपचार के बाद यह अत्यधिक संक्रामक है क्योंकि लगभग 95% लोग प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षित होते हैं और इससे पीड़ित लोग भी उपचार के मात्र 2 सप्ताह बाद ही संक्रामक नहीं रह जाते.
कुष्ठरोग के उन्नत रूपों से जुड़ा सदियों पुराना सामाजिक-कलंक, दूसरे शब्दों में कुष्ठरोग का कलंक, अनेक क्षेत्रों में आज भी मौजूद है और यह अभी भी स्व-सूचना और जल्द उपचार के प्रति एक बड़ी बाधा बना हुआ है। 1930 के दशक के अंत में डैप्सोन dapsone और इसके व्युत्पन्नों की प्रस्तुति के साथ ही कुष्ठरोग के लिये प्रभावी उपचार प्राप्त हुआ। शीघ्र ही डैप्सोन dapsone के प्रति प्रतिरोधी कुष्ठरोग दण्डाणु विकसित हो गया और डैप्सोन dapsone के अति-प्रयोग के कारण यह व्यापक रूप से फैल गया। 1980 के दशक के प्रारंभ में बहु-औषधि उपचार मल्टीड्रग थेरपी एमडीटी MDT के आगमन से पूर्व तक समुदाय के भीतर इस बीमारी का निदान और उपचाकर पाना संभव नहीं हो सका था।
बहु-दण्डाणुओं के लिये एमडीटी MDT 12 माह तक ली जाने वाली राइफैम्पिसिन rifampicin, डैप्सोन dapsone और क्लोफैज़िमाइन clofazimine से मिलकर बना होता है। बच्चों और वयस्कों के लिये उपयुक्त रूप से समायोजित खुराकें सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में ब्लिस्टर के पैकेटों के रूप में उपलब्ध हैं। एकल घाव वाले कुष्ठरोग के लिये एकल खुराक वाला एमडीटी MDT राइफैम्पिसिन rifampicin, ऑफ्लॉक्सैसिन ofloxacin और माइनोसाइक्लाइन minocycline से मिलकर बना होता है। एकल खुराक वाली उपचार रणनीतियों की ओर बढ़ने के कारण कुछ क्षेत्रों में इस बीमारी के प्रसार में कमी आई है क्योंकि इसका प्रसार उपचार की अवधि पर निर्भर होता है।
कुष्ठरोग और इसके पीड़ितों के प्रति जागरुकता बढ़ाने के लिये विश्व कुष्ठरोग दिवस वर्ल्ड लेप्रसी डे की स्थापना की गई।

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1. वर्गीकरण
कुष्ठरोग के वर्गीकरण के अनेक विभिन्न तरीके हैं, लेकिन वे एक दूसरे के समानांतर हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन की प्रणाली जीवाणु के प्रसरण के आधार पर" पॉसीबैसीलरी paucibacillary” और "मल्टिबैसीलरी multibacillary" के रूप में वर्गीकरण करती है"पॉसी- pauci-" निम्न गुणवत्ता को उल्लेखित करता है।)
शे SHAY मापन पांच श्रेणियां प्रदान करता है।
आईसीडी-10 ICD-10, हालांकि डब्ल्यूएचओ WHO द्वारा विकसित है, लेकिन यह डब्ल्यूएचओ WHO प्रणाली का नहीं, बल्कि रिडले-जॉपलिंग Ridley-Jopling प्रणाली का प्रयोग करता है। यह एक मध्यवर्ती" आई” "I" प्रविष्टि भी जोड़ता है।
मेश MeSH में, तीन समूहीकरणों का प्रयोग किया जाता है।
ट्युबरक्युलॉइड और लेप्रोमेटस रूपों के विरुद्ध प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाओं में अंतर होता है।
हैन्सेन रोग को निम्नलिखित प्रकारों में भी बांटा जा सकता है 344-346
बॉर्डरलाइन लेप्रोमेटस कुष्ठरोग
ल्युसियो Lucio और लैटापि Latapí का विकीर्ण कुष्ठरोग
लेप्रोमेटस कुष्ठरोग
बॉर्डरलाइन कुष्ठरोग
हिस्टॉइड कुष्ठरोग
ट्युबरक्युलॉइड कुष्ठरोग
प्रारंभिक और अनिश्चित कुष्ठरोग
बॉर्डरलाइन ट्युबरक्युलॉइड कुष्ठरोग
यह बीमारी केवल नसों की सहभागिता के साथ भी हो सकती है, जिसमें त्वचा पर कोई घाव नहीं होते. इस बीमारी को हैन्सेन का रोग भी कहा जाता है।

2. संकेत व लक्षण
त्वचा पर घाव प्राथमिक बाह्य संकेत हैं। यदि इसे अनुपचारित छोड़ दिया जाए, तो कुष्ठरोग बढ़ सकता है, जिससे त्वचा, नसों, हाथ-पैरों और आंखों में स्थायी क्षति हो सकती है। लोककथाओं के विपरीत, कुष्ठरोग के कारण शरीर के अंग अलग होकर गिरते नहीं, हालांकि इस बीमारी के कारण वे सुन्न तथा/या रोगी बन सकते हैं।

3.1. कारण माइकोबैक्टेरियम लेप्री Mycobacterium leprae
माइकोबैक्टेरियम लेप्री Mycobacterium leprae और माइकोबैक्टेरियम लेप्रोमैटॉसिस Mycobacterium lepromatosis कुष्ठरोग का कारण बनने वाले एजेंट हैं। एम. लेप्रोमेटॉसिस M. lepromatosis पहचाना गया अपेक्षाकृत नया माइकोबैक्टेरियम है, जिसे 2008 में विकीर्ण लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के एक जानलेवा मामले से पृथक किया गया था।
एक अंतर्कोशिकीय, अम्ल-तीव्र बैक्टेरियम, एम. लेप्री M. leprae वायुजीवी और दण्ड के आकार का होता है और यह माइकोबैक्टेरियम प्रजातियों की मोम-जैसी कोशिका झिल्ली आवरण विशेषता से घिरा होता है।
स्वतंत्र विकास के लिये आवश्यक जीन की अत्यधिक हानि के कारण, एम. लेप्री M. leprae और एम. लेप्रोमेटॉसिस M. lepromatosis को प्रयोगशाला में निर्मित नहीं किया जा सकता, एक ऐसा कारक जो कोच की अभिधारणा की एक दृढ़ व्याख्या के अंतर्गत निर्णायक रूप से इस जीव की पहचान करने में कठिनाई उत्पन्न कर देता है। गैर-संवर्धन-आधारित तकनीकों, जैसे आण्विक आनुवांशिकी ने कारण-कार्य-संबंध की वैकल्पिक स्थापना की अनुमति दी है।
हालांकि, अभी तक इसके उत्पादक जीवों को प्रयोगशाला में संवर्धित कर पाना असंभव रहा है, लेकिन उन्हें पशुओं में विकसित कर पाना संभव हुआ है। यूनाइटेड स्टेट्स लेप्रसी पैनल United States Leprosy Panel के चेयरमैन, चार्ल्स शेपर्ड Charles Shepard ने 1960 में चूहों के पैरों के पंजों में इन जीवों को सफलतापूर्वक विकसित किया। 1970 में जोसेफ कॉल्सन Joseph Colson और रिचर्ड हिल्सन Richard Hilson ने सेंट जॉर्ज हॉस्पिटल, लंदन में जन्मजात रूप से बाल्यग्रंथि-हीन चूहे ‘नग्न चूहे’ के प्रयोग द्वारा इस विधि में सुधार किया।
एक अन्य पशु मॉडल एलीनॉर स्टॉर्स Eleanor Storrs द्वारा गल्फ साउथ रिसर्च इंस्टीट्यूट Gulf South Research Institute में विकसित किया गया। डॉ॰ स्टॉर्स ने अपनी पीएचडी PhD के लिये नौ-धारियों वाले वर्मी armadillos पर कार्य किया था क्योंकि इस पशु के शरीर का तापमान मनुष्यों के शरीर के तापमान से कम था और इसलिये यह एक उपयुक्त पशु मॉडल हो सकता था। यह कार्य 1968 में वाल्डेमर किर्शीमर Waldemar Kirchheimer द्वारा प्रदान की गई सामग्री के साथ कारविल Carville, लुइज़ियाना Louisiana में यूनाइटेड स्टेट्स पब्लिक हेल्थ लेप्रोसैरियम United States Public Health Leprosarium में प्रारंभ हुआ। ये प्रयोग असफल सिद्ध हुए, लेकिन लियोनार्ड’स वुड मेमोरियल Leonards Wood Memorial के चिकित्सीय निदेशक चैपमैन बिनफोर्ड Chapman Binford द्वारा 1970 में प्रदान की गई सामग्री के साथ किया गया अतिरिक्त कार्य सफल रहा. इस मॉडल का वर्णन करने वाले शोध-पत्रों के परिणामस्वरूप प्राथमिकता पर एक विवाद छिड़ गया। जब इस बात की खोज हुई कि लुइज़ियाना में पाये जाने वाले जंगली वर्मी प्राकृतिक रूप से ही कुष्ठरोग से संक्रमित थे, तो आगे एक और विवाद का जन्म हुआ।
प्राकृतिक रूप से होने वाला संक्रमण गैर-मानवीय वानरों में भी प्राप्त हुआ है, जिनमें अफ्रीकी चिंपांज़ी African chimpanzee, सूटी मैंगेबी sooty mangabey और साइनोमॉल्गस मकैक cynomolgus macaque शामिल हैं।

3.2. कारण आनुवांशिकी
अनेक जीन कुष्ठरोग के प्रति संवेदनशीलता से जुड़े हुए हैं।

4. रोगलक्षण-शरीरक्रिया विज्ञान
कुष्ठरोग के संचरण की क्रियाविधि लंबा निकट संपर्क और अनुनासिक बूंदों द्वारा संचरण है। मानवों के अतिरिक्त जिस एकमात्र जीव में कुष्ठरोग होने की जानकारी मिली है, वह नौ-धारियों वाला वर्मी है। चूहे के पैरों के पंजों में प्रविष्ट करके इस जीवाणु को प्रयोगशाला में भी विकसित किया जा सकता है। इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि एम. लेप्री से संक्रमित सभी लोगों में कुष्ठरोग विकसित नहीं होता और लंबे समय यह माना जाता रहा है कि इसमें आनुवांशिक कारकों की भी एक भूमिका होती है क्योंकि कुछ विशिष्ट परिवारों में कुष्ठरोग का गुच्छन देखा गया है और यह समझ पाने में सफलता प्राप्त नहीं हो सकी है कि क्यों कुछ लोगों में लेप्रोमेटस कुष्ठरोग विकसित हो जाता है, जबकि अन्य लोगों में कुष्ठरोग के दूसरे प्रकार विकसित होते हैं। ऐसा अनुमान है कि आनुवांशिक कारकों के कारण केवल 5% लोगों में ही कुष्ठरोग होने का खतरा होता है। अधिकांशतः इसका कारण यह है कि शरीर इस जीवाणु के प्रति प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षी होता है और जो लोग इससे संक्रमित हो जाते हैं, वे इस बीमारी के प्रति एक तीव्र एलर्जी भरी प्रतिक्रिया का अनुभव कर रहे हैं। हालांकि इस चिकित्सीय व्याख्या के निर्धारण में आनुवांशिक कारकों की भूमिका पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त, कुपोषण और संक्रमित व्यक्ति के साथ लंबे समय तक संपर्क भी इस प्रकट बीमारी के विकास में भूमिका निभा सकता है।
यह विश्वास सबसे व्यापक तौपर प्रचलित है कि यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति और स्वस्थ व्यक्ति के बीच संपर्क के द्वारा संचरित होती है। सामान्यतः संपर्क की निकटता संक्रमण की मात्रा पर निर्भर होती है, जो कि स्वतः ही बीमारी के होने पर निर्भर है। निकट संपर्क को प्रोत्साहित करने वाली विभिन्न स्थितियों में से घर के भीतर होने वाला संपर्क ही वह एकमात्र स्थिति है, जिसे सरलता से पहचाना जा सकता है, हालांकि संपर्कों की घटनायें और उनसे संबंधित जोखिम के बीच विभिन्न अध्ययनों में बहुत अधिक अंतर दिखाई देता है। विस्तार अध्ययनों में, लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के संपर्कों के लिये संक्रमण की दरें सेबु, फिलीपीन्स में 6.2 प्रति 1000 प्रति वर्ष से लेकर दक्षिणी भारत के कुछ भागों में 55.8 प्रति 1000 प्रति वर्ष तक रही हैं।
मानव शरीर से एम. लेप्री के दो निकास मार्गों के रूप में अक्सर त्वचा व अनुनासिक श्लेष्म का वर्णन किया जाता है, हालांकि उनका सापेक्ष महत्व स्पष्ट नहीं है। लेप्रोमेटस के मामले अंतर्त्वचा में गहराई तक जीवों की बड़ी मात्रा को दर्शाते हैं, लेकिन इस बात में संदेह है कि क्या वे पर्याप्त मात्रा में त्वचा की सतह तक पहुंचते हैं। हालांकि उतरी हुई त्वचा त्वचा की ऊपरी सतह का उतरना में अम्ल-तीव्र दण्डाणुओं के पाये जाने की खबरें मिली हैं, लेकिन 1963 में वेडेल व अन्य Weddell et al. ने बताया कि मरीजों और उनके संपर्क में आने वाले लोगों से बहुत बड़ी मात्रा में लिये गये नमूनों के परीक्षण के बावजूद भी उन्हें उपकला में कोई अम्ल-तीव्र दण्डाणु प्राप्त नहीं हुए थे। एक हालिया अध्ययन में, जॉब व अन्य Job et al. ने लेप्रोमेटस कुष्ठरोग के रोगियों की त्वचा की ऊपरी केराटिन परत में एम. लेप्री M. leprae पर्याप्त मात्रा प्राप्त करने की जानकारी देते हुए यह सुझाव दिया कि संभव है कि इस जीवाणु की निकासी वसामय स्रावों के साथ होती हो.
अनुनासिक श्लेष्म, विशेष रूप से व्रण-युक्त श्लेष्म, का महत्व शैफेर Schäffer द्वारा 1898 में ही पहचान लिया गया था। लेप्रोमेटस कुष्ठरोग में अनुनासिक श्लेष्मक घावों से दण्डाणु की मात्रा का प्रदर्शन शेपर्ड द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था और उनकी संख्या 10.000 से 10.000.000 के बीच थी। पेडले Pedley ने बताया कि अधिकांश लेप्रोमेटस मरीजों की बहती हुई नाक से लिये गये अनुनासिक स्रावों में कुष्ठरोग दण्डाणु प्राप्त हुए. डैवे Davey और रीस Rees ने संकेत दिया कि लेप्रोमेटस मरीजों के अनुनासिक स्राव में प्रतिदिन 10 मिलियन विकासक्षम जीव उत्पन्न हो सकते हैं।
मानव शरीर में एम. लेप्री M. leprae के प्रवेश का मार्ग भी निश्चित रूप से ज्ञात नहीं है: त्वचा और ऊपरी श्वसन तंत्र सबसे संभावित मार्ग हैं। पुराने अनुसंधान जहां त्वचा मार्ग का अध्ययन कर रहे थे, वहीं हालिया अनुसंधान द्वारा श्वसन तंत्र का समर्थन बढ़ता जा रहा है। रीस Rees और मैकडॉगाल McDougall ने प्रतिरक्षा-प्रतिबन्धित चूहों में एम. लेप्री M. leprae युक्त के माध्यम से कुष्ठरोग का प्रयोगात्मक संचरण कर पाने में सफलता प्राप्त की, जिससे मनुष्यों में भी इसी तरह की संभावना व्यक्त की गई। नग्न चूहों के साथ किये गये उन परीक्षणों के सफल परिणाम मिलने की जानकारी प्राप्त हुई है, जिनमें एम. लेप्री M. leprae को सामयिक अनुप्रयोग के द्वारा अनुनासिक छिद्र से प्रविष्ट किया गया था। संक्षेप में, श्वसन तंत्र के माध्यम से प्रवेश सर्वाधिक संभावित मार्ग है, हालांकि अन्य मार्ग, विशेष रूप से टूटी हुई त्वचा, की उपेक्षा नहीं की जा सकती. सीडीसी CDC ने इस बीमारी के संचरण के बारे में निम्नलिखित धारणा व्यक्त की है: हालांकि हैन्सेन के रोग के संचरण का मार्ग अनिश्चित बना हुआ है, लेकिन अधिकांश शोधकर्ता मानते हैं कि सामान्यतः एम. लेप्री M. leprae श्वसन बूंदों के द्वारा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैलता है।
कुष्ठरोग में, उष्मायन काल और संक्रमण के समय तथा बीमारी की शुरुआत के मापन दोनों के ही लिये सन्दर्भ बिंदु परिभाषित कर पाना कठिन है; पहला वाला पर्याप्त प्रतिरक्षात्मक उपकरणों के कारण और दूसरा बीमारी की धीमी शुरुआत के कारण. इसके बावजूद, विभिन्न शोधकर्ताओं ने कुष्ठरोग के लिये उष्मायन काल का मापन करने का प्रयास किया है। न्यूनतम उष्मायन काल कुछ सप्ताहों जितना संक्षिप्त होने की जानकारी मिली है और यह नवजात शिशुओं में कुष्ठरोग की अक्सर होने वाली घटनाओं पर आधारित है। अधिकतम उष्मायन काल 30 वर्ष, या उससे अधिक, लंबा होने की जानकारी मिली है, जैसा कि युद्ध के उन पुराने सिपाहियों में देखा गया है, जिनके बारे में यह ज्ञात है कि वे थोड़े समय के लिये वे संक्रमण के स्थानीय क्षेत्रों के संपर्क में आये थे, लेकिन अन्यथा वे गैर-स्थानीय क्षेत्रों में रह रहे थे। सामान्यतः इस बात पर सहमति है कि औसत उष्मायन काल तीन से पांच वर्षों का होता है।

5. रोकथाम
वेनेज़ुएला के डॉ॰ जैसिन्टो कॉन्विट Dr. Jacinto Convit ने तपेदिक के टीके और माइटोकॉन्ड्रियम लैप्री Mycobacterium leprae से एक टीके का संश्लेषण किया, एक असाधारण कार्य, जिसके लिये उन्हें 1990 के दशक के अंत में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार के लिये नामांकन प्राप्त हुआ।
हालिया परीक्षणों में, राइफैम्पिसिन rifampicin की एकल खुराक ने बीमारी से संपर्क के दो वर्ष बाद कुष्ठरोग विकसित होने की दर को 57% कम कर दिया; इस अवधि में राइफैम्पिसिन rifampicin के साथ किये गये 265 उपचारों ने कुष्ठरोग के एक मामले को रोका. एक गैर-यादृच्छिकृत अध्ययन में पाया गया कि राइफैम्पिसिन rifampicin तीन वर्ष बाद कुष्ठरोग के नये मामलो की संख्या 75% घटा दी.
बीसीजी BCG कुष्ठरोग तथा साथ ही तपेदिक के खिलाफ सुरक्षा की एक परिवर्तनीय मात्रा प्रस्तावित करती है।
इस बीमारी को मिटाने की राह में आ रही स्थायी बाधाओं से निपटने के प्रयासों में पहचान में सुधार, मरीजों और लोगों को इसके कारणों के बारे में शिक्षित करना और इस बीमारी, जिसके मरीजों को ऐतिहासिक रूप से" अस्वच्छ” या" ईश्वर द्वारा शापित” मानकर बहिष्कृत किया जाता रहा है, से जुड़ी सामाजिक वर्जनाओं से लड़ना शामिल है। कुष्ठरोग आनुवंशिक बीमारी नहीं है। जहां वर्जनाएं मज़बूत हैं, उन क्षेत्रों में मरीजों पर अपनी स्थिति को छिपाने और उपचार ढूंढने से बचने पर बाध्य किया जा सकता है, ताकि भेद-भाव से बचा जा सके. हैन्सेन के रोग के बारे में जागरुकता के अभाव के चलते लोग यह विश्वास गलत ढंग से कर सकते हैं कि यह बीमारी अत्यधिक संक्रामक और असाध्य है।
इथियोपिया का अलर्ट ALERT अस्पताल और अनुसंधान केंद्र पूरे विश्व के चिकित्सा कर्मियों को कुष्ठरोग के उपचार का प्रशिक्षण प्रदान करता है और साथ ही अनेक स्थानीय मरीजों का उपचार भी करता है। शल्य-चिकित्सीय तकनीकें, जैसे अंगूठों की गतिविधि के नियंत्रण की पुनर्प्राप्ति के लिये, विकसित की जा चुकी हैं।

6. उपचार
1993 में कुष्ठरोग की कीमोथेरपी Chemotherapy of Leprosy पर डब्ल्यूएचओ WHO के अध्ययन-दल ने दो प्रकार के मानक एमडीटी MDT परहेज नियमों को अपनाए जाने की अनुशंसा की. पहला मल्टिबैसीलरी multibacillary एमबी MB या लेप्रोमेटस) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन rifampicin, क्लोफैज़िमाइन clofazimine और डैप्सोन dapsone के प्रयोग द्वारा 24-माह का एक उपचार था। दूसरा पॉसिबैसीलरी paucibacillary पीबी PB or ट्युबरक्युलॉइड) के मामलों के लिये राइफैम्पिसिन rifampicin और डैप्सोन dapsone का प्रयोग करके छः माह का एक उपचार था। एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में कुष्ठरोग को मिटाने पर पहले अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन First International Conference on the Elimination of Leprosy as a Public Health Problem, जो कि अगले वर्ष हनोई में आयोजित किया गया था, में वैश्विक रणनीति को प्रोत्साहन दिया गया और सभी स्थानिक देशों तक एमडीटी MDT का प्रबंध और आपूर्ति करने के लिये डब्ल्यूएचओ WHO को फंड प्रदान किया गया।
1995 और 1999 के बीच, डब्ल्यूएचओ WHO ने, निप्पॉन फाउंडेशन Nippon Foundation चेयरमैन योहेई सासाकावा Yōhei Sasakawa, कुष्ठरोग मिटाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन के सद्भावना दूत वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन Goodwill Ambassador for Leprosy Elimination) की सहायता से, सभी स्थानिक देशों में ब्लिस्टर पैक में एमडीटी MDT का मुफ्त वितरण किया, जिसकी वितरण व्यवस्था स्वास्थ्य मंत्रालयों के माध्यम से की गई। एमडीटी MDT के उत्पादक नोवार्टिस Novartis द्वारा दिये गये दान के बाद वर्ष 2000 में मुफ्त-वितरण के इस प्रावधान को आगे बढ़ा दिया गया और अब यह कम से कम 2010 के अंत तक जारी रहेगा. राष्ट्रीय स्तर पर, राष्ट्रीय कार्यक्रमों से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों एनजीओ NGOs को सरकार के द्वारा डब्ल्यूएचओ WHO से प्राप्त इस एमडीटी MDT की आपूर्ति की जाती रहेगी.
एमडीटी MDT अत्यधिक प्रभावी बना हुआ है और अब पहली मासिक खुराक के बाद से ही मरीज संक्रामक नहीं रह जाते. कैलेंडर ब्लिस्टर पैक में इसकी प्रस्तुति के कारण वास्तविक स्थितियों में इसका प्रयोग करना सुरक्षित और सरल है। पुनरावर्तन की दरें निम्न बनी हुई हैं और संयोजित दवाओं के प्रति कोई प्रतिरोध ज्ञात नहीं हुआ है। कुष्ठरोग पर डब्ल्यूएचओ की सातवीं विशेषज्ञ समिति सेवंथ डब्ल्यूएचओ एक्सपर्ट कमिटी ऑन लेप्रसी, ने 1997 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते समय, ये निष्कर्ष दिया कि उपचार की एमबी MB अवधि - जो उस समय 24 माह थी - को" प्रभावोत्पादकता से कोई उल्लेखनीय समझौता किये बिना” सुरक्षित रूप से कम करके 12 माह किया जा सकता है।

6.1. उपचार वर्तमान सिफारिशें
पॉसी-बैसीलरी कुष्ठरोग त्वचा पर 1-5 घाव 6 माह तक राइफैम्पिसिन rifampicin और डैप्सोन dapsone के साथ उपचार करें
मल्टी-बैसीलरी कुष्ठरोग त्वचा पर 5 घाव 12 माह तक राइफैपिसिन rifampicin, क्लॉफैज़िमाइन clofazimine और डैप्सोन dapsone से उपचार करें

6.2. उपचार ऐतिहासिक उपचार
प्राचीन ग्रीक में यह रोग श्लीपद elephantiasis graecorum के नाम से जाना जाता था। बाइबिल मैथ्यू 11.5 के अनुसार कुष्ठरोग को अलौकिक साधनों और हाथों को या इससे विकसित अवशेषों को दफना देने की पद्धति के द्वारा कुष्ठरोग का उपचार किया जा सकता है। सेंट गाइल्स, सेंट मार्टिन, सेंट मैक्सिलियन और सेंट रोमन इस पद्धति से जुड़े हुए थे। अनेक शासक भी इस पद्धति से जुड़े हुए थे: इनमें इंग्लैंड के रॉबर्ट प्रथम, एलिज़ाबेथ प्रथम, हेनरी तृतीय और शार्लेमैग्ने Charlemagne शामिल थे।
विभिन्न कालों में रक्त को एक पेय-पदार्थ या स्नान के रूप में एक उपचार माना जाता था। कुंवारी स्रियों या बच्चों के रक्त को विशेष रूप से प्रभावी समझा जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि इस पद्धति का उदगम प्राचीन मिस्र निवासियों से हुआ, लेकिन चीन में भी इसका पालन किये जाने की जानकारी मिली है, जहां लोगों के रक्त के लिये उनकी हत्या कर दी गई थी। यह पद्धति 1790 में डी सेक्रेटिस नैचुरी De Secretis Naturae में कुत्ते के रक्त के प्रयोग का उल्लेख किये जाने तक जारी थी। पैरासेल्सस Paracelsus ने मेमने के रक्त के प्रयोग की अनुशंसा की और मृत शरीरों के रक्त का प्रयोग भी किया जाता था।
पलाइनी Pliny, एरेशियस ऑफ कैपाडोसिया Areteus of Capadocia तथा थियोडोरस Theodorus के अनुसार सांपों का प्रयोग भी किया जाता था। गॉशर Gaucher ने कोबरा के ज़हर से उपचार करने की अनुशंसा की. 1913 में, बॉइनेट Boinet ने मधुमक्खियों के डंक की बढ़ती हुई मात्रा को बढ़ाते हुए 4000 तक परीक्षण किया। सांपों के स्थान पर कभी-कभी बिच्छुओं और मेंढकों का प्रयोग किया जाता था। एनाबास Anabas चढ़नेवाली मछली के मल का भी परीक्षण किया गया।
वैकल्पिक उपचारों में आर्सेनिक और हेलेबोर hellebore सहित जलन उत्पन्न करने वाले अन्य तत्वों के प्रयोग के साथ या उनके बिना दागना शामिल था। मध्य-काल में का वंध्यकरण Castration का पालन भी किया जाता था।
चालमुगरा का तेल
चालमुगरा Chaulmoogra का तेल कुष्ठरोग का एक पूर्व-आधुनिक उपचार था। एक भारतीय दन्तकथा के अनुसार श्रीराम को कुष्ठरोग हो गया था और कलव हाइड्नोकार्पस Hydnocarpus वंश की एक प्रजाति) वृक्ष के फल खिलाकर उनका उपचार किया गया। इसके बाद उसी फल से उन्होंने राजकुमारी पिया का उपचार किया और फिर इस जोड़े ने बनारस लौटकर अपनी इस खोज के बारे में दुनिया को बताया.
भारत में इस तेल का प्रयोग लंबे समय से कुष्ठरोग और त्वचा की विभिन्न अवस्थाओं के उपचार के लिये एक आयुर्वेदिक दवा के रूप में किया जाता रहा है। इसका प्रयोग चीन और बर्मा में भी होता रहा है और बंगाल मेडिकल कॉलेज के एक प्रोफेसर फ्रेडरिक जॉन मॉट Frederic John Mouat ने पश्चिमी विश्व को इससे परिचित करवाया. उन्होंने कुष्ठरोग के दो मामलों में एक मौखिक और स्थानिक एजेंट के रूप में इस तेल का प्रयोग करने का प्रयास किया और 1854 में एक शोध-पत्र में उल्लेखनीय सुधार की जानकारी दी.
इस शोध-पत्र ने थोड़ा भ्रम उत्पन्न कर दिया. मॉट Mouat ने सूचित किया कि यह तेल चालमुगरा ओडोराटा Chaulmoogra odorata वृक्ष का एक उत्पाद है, जिसका वर्णन 1815 में विलियम रॉक्सबर्ग William Roxburgh, एक शल्य-चिकित्सक और प्रकृतिवादी, द्वारा किया गया था, जब वे कलकत्ता में ईस्ट इंडिया कम्पनी के बॉटनिकल गार्डन में वनस्पतियों का सूचीकरण कर रहे थे। इस वृक्ष को गाइनोकार्डिया ओडोराटा Gynocardia odorata नाम से जाना जाता है। 19वीं सदी के शेष भाग में इस वृक्ष को ही इस तेल का स्रोत माना जाता रहा. 1901 में सर डेविड प्रेन Sir David Prain ने कलकत्ता बाज़ाऔर पेरिस और लंदन के औषधिकारों के सच्चे चालमुगरा बीजों की पहचान टारक्टोजीनस कुर्ज़ी Taraktogenos kurzii से प्राप्त होने वाले बीजों के रूप में की, जो की बर्मा और उत्तरी भारत में पाया जाता है। आयुर्वेदिक ग्रंथों में जिस तेल का उल्लेख है वह हाइड्नोकार्पस विगिताना Hydnocarpus wightiana वृक्ष से प्राप्त होता है, जिसे संस्कृत में तुवकाऔर हिंदी व फारसी में चालमुगरा कहा जाता है।
पहला आन्त्रेतर प्रबंध मिस्र के चिकित्सक टॉर्टोलिस बे Tortoulis Bey, सुल्तान हुसैन कामेल Hussein Kamel के व्यक्तिगत चिकित्सक, द्वारा दिया गया था। वे तपेदिक के लिये क्रियोसाइट के प्रत्युपयाजक इंजेक्शन का प्रयोग करते आ रहे थे और 1894 में उन्होंने मिस्र के एक 36-वर्षीय कॉप्ट, जो मौखिक उपचार को सह पाने में असमर्थ रहा था, में चालमुगरा के प्रत्युपयाजक इंजेक्शन का प्रबंध किया। 6 वर्षों और 584 इंजेक्शनों के बाद घोषित किया गया कि वह मरीज ठीक हो चुका था।
इस तेल का एक प्रारंभिक वैज्ञानिक विश्लेषण 1904 में फ्रेडरिक बी. पॉवर Frederick B. Power द्वारा लंदन में किया गया। उन्होंने और उनके साथियों ने इन बीजों से एक नये असंतृप्त वसायुक्त-अम्ल को पृथक किया, जिसे उन्होंने ‘चालमुगरिक अम्ल chaulmoogric acid’ नाम दिया. उन्होंने दो निकट संबंद्ध प्रजातियों का भी परीक्षण किया: हाइड्नोकार्पस एन्थेल्मिंटिका Hydnocarpus anthelmintica और हाइड्नोकार्पस विग्टियाना Hydnocarpus wightiana. इन दो वृक्षों से उन्होंने चालमुगरिक अम्ल और एक निकट संबंद्ध यौगिक, हाइड्नोकार्पस अम्ल hydnocarpus acid, दोनों को अलग किया। उन्होंने गाइनोकार्डिया ओडोराटा Gynocardia odorata का परीक्षण भी किया और पाया कि यह इनमें से कोई भी अम्ल उत्पन्न नहीं करता था। बाद में किये गये अनुसंधानों ने यह दर्शाया कि ‘टाराक्टोगेनॉस taraktogenos हाइड्नोकार्पस कुर्ज़ी Hydnocarpus kurzii) भी चालमुगरिक अम्ल उत्पन्न करता था।
इस तेल के प्रयोग से जुड़ी एक अन्य समस्या इसके प्रबंध को लेकर है। मुंह से लिये जाने पर यह अत्यधिक मिचली उत्पन्न करता है। वस्ति से दिये जाने पर यह गुदा-द्वार के आस-पास छाले और दरारें उत्पन्न कर सकता है। इंजेक्शन के द्वारा दिये जाने पर इस दवा ने बुखाऔर अन्य स्थानीय प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं. इन कठिनाइयों के बावजूद 1916 में राल्फ हॉपकिन्स Ralph Hopkins, जो कि कारविल Carville, लुइज़ियाना Louisiana स्थित लुइज़ियाना लेपर होम Louisiana Leper Home के उपस्थायी चिकित्सक थे, द्वारा 170 मरीजों की एक श्रृंखला का वर्णन किया गया। उन्होंने मरीजों को दो समूहों में विभाजित किया- आरंभिक और विकसित. विकसित मामलों में, अधिकतम एक चौथाई ने अपनी स्थिति में कोई सुधार या रोक प्रदर्शित की. आरंभिक मामलों में, उन्होंने 45% मरीजों में बीमारी की स्थिति में सुधार या स्थिरता की जानकारी दी; 4% की मृत्यु हो गई और 8% की मृत्यु हो गई। शेष मरीज होम से फरार हो गए जो कि संभवतः उन्नत स्थिति में थे।
इस एजेंट की स्पष्ट उपयोगिता को देखते हुए, इसके उन्नत सूत्रीकरण की खोज शुरु हुई. विक्टर हेज़र Victor Heiser, मनीला में कुष्ठरोगियों के लिये बने सैन लैज़ारो अस्पताल के व्यवस्थापक चिकित्सक मनीला और एलिडोरो मर्केडोथो के लिये मुख्य संगरोध अधिकारी और स्वास्थ्य निदेशक, ने चालमुगरा और रेसॉर्सिन के नुस्खे में कपूर को शामिल करने का निर्णय लिया, जो कि जर्मनी में मर्क एन्ड कम्पनी Merck and Company द्वारा विशिष्ट तौपर मौखिक रूप से दिया जाता था, जिनसे हेज़र ने संपर्क किया था। उन्होंने पाया कि यह नया यौगिक किसी भी प्रकार की मिचली, जिससे पूर्व में तैयार दवाओं को लेने में समस्या उत्पन्न हो रही थी, के बिना तुरंत अवशोषित कर लिया जाता था।
इसके बाद 1913 में में हेज़र Heiser और मर्सेडो Mercado ने दो मरीजों, जो कि इस बीमारी से उबर चुके लगते थे, में इंजेक्शन के द्वारा इस तेल का निरीक्षण किया। चूंकि इस उपचार का परीक्षण अन्य पदार्थों के साथ किया गया था, अतः इसके परिणाम स्पष्ट नहीं थे। इसके बाद पुनः दो मरीजों का उपचार इसी तेल के साथ इंजेक्शन के द्वारा और किसी भी अन्य उपचार के बिना किया गया और पुनः ऐसा प्रतीत हुआ कि वे इस बीमारी से ठीक हो गए हैं। अगले वर्ष हेज़र Heiser ने और 12 मरीजों का निरीक्षण किया, लेकिन इसके मिश्रित परिणाम प्राप्त हुए.
इस तेल के कम विषैले रूपों की खोज भी की गई जिन्हें इंजेक्शन के द्वारा शरीर में प्रविष्ट किया जा सके. इन तेलों के रासायनिक यौगिकों का वर्णन करने वाले शोध-पत्रों की एक श्रृंखला 1920 और 1922 के बीच प्रकाशित की गई। ये एलिस बॉल Alice Ball के कार्य पर आधारित रहे हो सकते हैं- इस बिंदु पर रिकॉर्ड स्पष्ट नहीं है और 1916 में ही सुश्री बॉल की मृत्यु हो गई। 1921 में इन रासायनिक यौगिकों के परीक्षण किये गये और वे उपयोगी परिणाम देने वाले प्रतीत हुए.
इन प्रयासों के पूर्व अन्य लोगों द्वारा भी प्रयास किये गये थे। मर्क ऑफ डार्म्सटाड Merck of Darmstadt ने 1891 में सोडियम लवणों का एक संस्करण उत्पन्न किया था। उन्होंने इस सोडियम का नाम गाइनोकार्डेट gynocardate रखा, जिसका कारण यह भ्रांत धारणा थी कि इस तेल का मूल-स्रोत गाइनोकार्डिया ओडोराटा Gynocardia odorata था। 1908 में बेयर ने ‘एंटिलेप्रोल Antileprol’ नाम से इन रासायनिक यौगिकों के एक वाणिज्यिक संस्करण का विपणन किया।
इसकी आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिये एजेंट जोसेफ रॉक Joseph Rock, कॉलेज ऑफ हवाई में सुव्यवस्थित वनस्पति-शास्र Systematic Botany के प्रोफेसर, ने बर्मा की यात्रा की. स्थानीय ग्रामीणों ने बीज में पेड़ों के एक झुरमुट की स्थापना की, जिसका प्रयोग करके उन्होंने 1921 और 1922 के बीच ओहाउ द्वीप, हवाई Island of Oahu, Hawaii में 2.980 वृक्ष लगाए.
इसके आम दुष्प्रभावों के बावजूद यह तेल 1940 के दशक में सल्फोन sulfone के आगमत तक लोकप्रिय बना रहा. इसकी प्रभावोत्पादकता के बारे में बहस तब तक जारी रही, जब तक कि इसका प्रयोग बंद नहीं कर दिया गया।
प्रोमिन Promin को पहली बार 1908 में फ्रीलबर्ग इम ब्रिस्गाउ Freiburg im Breisgau, जर्मनी स्थित एल्बर्ट-लुडविग यूनिवर्सिटी Albert-Ludwig University में रसायन-शास्र के प्रोफेसर एमिल फ्रोम Emil Fromm द्वारा संश्लेषित किया गया। उसकी स्ट्रेप्टोकॉल-विरोधी गतिविधि की पड़ताल ग्लैडस्टोन बटल Gladstone Buttle द्वारा बोरो वेलकम Burroughs Wellcome में और अर्नेस्ट फॉर्नियु Ernest Fourneau द्वारा इंस्टीट्युट पास्टियुर Institut Pasteur में की गई थी।
1940 के दशक में प्रोमिन promin का विकास होने तक, कुष्ठरोग के लिये कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं था। प्रोमिन की प्रभावोत्पादकता की खोज सबसे पहले गाय हेनरी फैगेट Guy Henry Faget और उनके सह-कर्मियों द्वारा 1943 में कारविल, लुइज़ियाना में की गई। 1950 के दशक में, डॉ॰ आर. जी. कॉकार्न ने कारविल में डैप्सोन dapsone को प्रस्तुत किया। यह एम. लेप्री M. leprae के विरुद्ध जीवाणुओं की वृद्धि को सीमित करके संक्रमण को रोक पाने में कमजोर है और मरीजों के लिये अनिश्चित काल तक इस दवा का सेवन करते रहना आवश्यक माना गया। जब केवल डैप्सोन dapsone का प्रयोग किया जाता था, तो एम. लेप्री M. leprae की जनसंख्या ने बहुत जल्दी ही इस एंटीबायोटिक प्रतिरोध विकसित कर लिया; 1960 के दशक तक, विश्व की एक मात्र ज्ञात कुष्ठरोग-विरोधी दवा वास्तव में अनुपयोगी हो चुकी थी।
कुष्ठरोग-विरोधी अधिक प्रभावी दवाओं की खोज के परिणामस्वरूप 1960 के दशक और 1970 के दशक में क्लोफैज़िमाइन clofazimine और राइफैम्पिसिन rifampicinin का प्रयोग शुरु हुआ। इसके बाद, भारतीय वैज्ञानिक शांताराम यावलकर Shantaram Yawalkar और उनके सहयोगियों ने राइफैम्पिसिन rifampicin और डैप्सोन dapsone का प्रयोग करके एक संयुक्त उपचार का सूत्रण किया, जिसका लक्ष्य जीवाण्विक प्रतिरोध को घटाना था। इस संयुक्त उपचार के प्रारंभिक परीक्षण 1970 के दशक में माल्टा में किये गये।
1981 में डब्ल्यूएचओ WHO की विशेषज्ञ समिति द्वारा पहली बार इन तीनों दवाओं के संयोजन से निर्मित बहु-औषधि उपचार मल्टीड्रग थेरपी एमडीटी MDT की अनुशंसा की गई। इन तीन कुष्ठरोग-विरोधी दवाओं का प्रयोग आज भी मानक एमडीटी MDT पथ्यों में किया जाता है। प्रतिरोध विकसित हो जाने के जोखिम के कारण इनमें से किसी को भी अकेले प्रयोग नहीं किया जाता.
यह उपचार काफी महंगा था और अधिकांश स्थानिक देशों में इसे शीघ्र नहीं अपनाया गया। 1985 में, कुष्ठरोग को अभी भी 122 देशों में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या माना जाता था। 1991 में जेनेवा Geneva में आयोजित 44वीं विश्व स्वास्थ्य सभा वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली डब्ल्यूएचए WHA ने वर्ष 2000 तक एक सार्वजनिक-स्वास्थ्य समस्या के रूप में कुष्ठरोग को मिटाने का एक प्रस्ताव पारित किया-जिसे इस बीमारी के वैश्विक प्रसार को 1 मामला प्रति 10.000 से भी कम मात्रा तक घटाने के रूप में परिभाषित किया गया था। इस सभा में, इसके सदस्य राज्यों द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन डब्ल्यूएचओ WHO को एक निर्मूलन रणनीति विकसित करने का जनादेश दिया गया, जो कि एमडीटी MDT की भौगोलिक कार्यक्षेत्र-व्याप्ति बढ़ाने और मरीजों तक उपचार की अभिगम्यता को बढ़ाने पर आधारित था।

7. महामारी विज्ञान
ऐसा अनुमान है कि कुष्ठरोग के कारण वैश्विक स्तर पर दो से तीन मिलियन लोग स्थायी रूप से विकलांग हो गए हैं। भारत में इसके मामलों की संख्या सबसे ज्यादा है, जिसके बाद ब्राज़ील दूसरे और बर्मा तीसरे स्थान पर है।
ऐसा अनुमान है कि 1999 में पूरे विश्व में हैन्सेन के रोग की घटनाओं की संख्या 640.000 थी। वर्ष 2000 में, 738.284 मामलों की पहचान हुई. वर्ष 2000 में, विश्व स्वास्थ्य संगठन वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन डब्ल्यूएचओ WHO ने 91 ऐसे देशों को सूचीबद्ध किया, जिनमें हैन्सेन का रोग स्थानिक है। कुल मामलों में से 70% भारत, म्यांमाऔर नेपाल से थे। विश्व-भर से मिलने वाले कुष्ठरोग के मामलों में 50% से अधिक केवल भारत में प्राप्त होते हैं। वर्ष 2002 में, वैश्विक स्तर पर 763.917 नए मामलों की पहचान हुई और उसी वर्ष डब्ल्यूएचओ WHO ने ब्राज़ील, मेडागास्कर, मोज़ाम्बिक, तंज़ानिया और नेपाल को हैन्सेन के कुल मामलों में से 90% मामलों की उपस्थिति वाले देशों के रूप में सूचीबद्ध किया।
डब्ल्यूएचओ WHO से प्राप्त हालिया आंकड़ों के अनुसार, 2003 से 2004 तक पूरे विश्व में पहचाने गए मामलों की संख्या में लगभग 107.000 मामलों या 21% की कमी आई है। गिरावट की ओर यह झुकाव पिछले तीन वर्षों से लगातार जारी रहा है। इसके अतिरिक्त, वैश्विक स्तर पर एचडी HD का पंजीकृत प्रसार 286.063 मामलों पर था; 2004 के दौरान 407.791 नए मामलों की पहचान हुई.
संयुक्त राज्य अमरीका में, हैन्सेन के रोग का निरीक्षण सेंटर्स फॉर डिसीज़ कण्ट्रोल एण्ड प्रिवेंशन Centers for Disease Control and Prevention सीडीसी CDC द्वारा किया जाता है, जिसने वर्ष 2002 में कुल 92 मामले प्राप्त होने की जानकारी दी. हालांकि वैश्विक स्तर पर मामलों की संख्या में गिरावट जारी है, लेकिन कुछ विशेष क्षेत्रों जैसे ब्राज़ील, दक्षिण एशिया भारत, नेपाल, अफ्रीका के कुछ भागों और पश्चिमी प्रशांत में उच्च प्रसार बना हुआ है।

7.1. महामारी विज्ञान जोखिम समूह
अपर्याप्त बिस्तरों, दूषित जल और अपर्याप्त भोजन, जैसी बुरी स्थितियों या प्रतिरोधी कार्य को घटाने वाली अन्य बीमारियों जैसे एचआईवी HIV) वाले स्थानिक क्षेत्रों में जी रहे लोगों के लिये जोखिम सबसे ज्यादा होता है। हालिया शोधों का सुझाव है कि कोशिका की मध्यस्थता से प्राप्त होने वाले प्रतिरोध में एक कमी है, जिसकी वजह से इस बीमारी के प्रति अतिसंवेदनशीलता उत्पन्न होती है। विश्व की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम लोग ही इस बीमारी को ग्रहण कर पाने में सक्षम हैं। डीएनए DNA का जो क्षेत्र इस परिवर्तनीयता के लिये ज़िम्मेदार है, वही पार्किंसन्स रोग में भी शामिल होता है, द लेप्रसी मिशन, कनाडा The Leprosy Mission Canada के अनुसार अधिकांश लोग –लगभग 95% जनसंख्या –प्राकृतिक रूप से प्रतिरक्षित होते हैं।

7.2. महामारी विज्ञान बीमारी का बोझ
यद्यपि संचरण के एक मापन के रूप में वार्षिक विस्तार - प्रतिवर्ष मिलने वाले कुष्ठरोग के नए मामलों की संख्या - महत्वपूर्ण है, लेकिन कुष्ठरोग के लंबे उष्मायन काल, बीमारी की शुरुआत के बाद इसके निदान में होने वाली देऔर बहुत शुरुआती चरणों में कुष्ठरोग की पहचान कर पाने के लिये प्रयोगशाला उपकरणों की कमी के कारण कुष्ठरोग का मापन कर पाना कठिन है। इसके बजाय, पंजीकृत प्रसार का प्रयोग किया जाता है। पंजीकृत प्रसार इस बीमारी के बोझ का एक उपयोगी प्रतिनिधि सूचक है क्योंकि यह समय के किसी भी बिंदु पर इस बीमारी के साथ निदान किये गये और एमडीटी MDT का उपचार प्राप्त कर रहे कुष्ठरोग के सक्रिय मामलों की संख्या दर्शाता है। पुनः प्रसार की दर को समय के किसी भी बिंदु पर जिस जनसंख्या में मामले प्राप्त हुए हों, उसमें एमडीटी MDT के लिये पंजीकृत मामलों की संख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है।
नए मामलो की पहचान इस बीमारी का एक अन्य सूचक है, जिसकी जानकारी देशों द्वारा सामान्यतः एक वार्षिक आधापर दी जाती है। उस वर्ष बीमारी की शुरुआत के रूप में निदान किये गये मामलों की संख्या वास्तविक विस्ताऔर पिछले वर्ष शुरु हुए मामलों का एक बड़ा अनुपात जिसे पहचाने न गए मामलों का संचित प्रसार कहा जाता है इसमें शामिल होता है।
स्थानिक देश भी पहचान के समय स्थापित विकलंगता के नए मामलों की संख्या की जानकारी देते हैं, जो कि संचित प्रसार का एक सूचक है। इस बीमारी की शुरुआत के समय का निर्धारण कर पाना सामान्यतः अविश्वसनीय होता है, बहुत श्रम-साध्य होता है और शायद ही कभी इन आंकड़ों की रिकॉर्डिंग में किया जाता है।

7.3. महामारी विज्ञान वैश्विक स्थिति
2006 में 115 देशों और क्षेत्रों द्वारा डब्ल्यूएचओ WHO को दी गई जानकारी और वीकली एपिडेमियोलॉजिकल रिकार्ड Weekly Epidemiological Record में प्रकाशित खबर के अनुसार उस वर्ष के प्रारंभ में कुष्ठरोग का वैश्विक पंजीकृत प्रसार 219.826 मामलों पर था। पिछले वर्ष 2005- वह अंतिम वर्ष, जिसके लिये देशों की पूरी जानकारी उपलब्ध थी के दौरान पहचाने गए नए मामलों की संख्या 296.499 थी। इस वार्षिक पहचान की संख्या उस वर्ष के अंत में इसके प्रसार से अधिक होने का कारण इस तथ्य के द्वारा समझाया जा सकता है कि नए मामलों के एक भाग ने एक वर्ष के भीतर अपना उपचार पूरा कर लिया और अतः वे अब रजिस्टर में नहीं रहे. वैश्विक स्तर पर पहचाने जाने वाले नए मामलों की संख्या में गिरावट जारी है और 2005 में इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 110.000 मामलों 27% की कमी आई.
सारणी 1 दर्शाती है कि 2001 से वैश्विक वार्षिक पहचान दर में गिरावट जारी है। अफ्रीका क्षेत्र में 2004 की तुलना में नए मामलों की संख्या में 8.7% की गिरावट देखी गई। अमरीकियों के लिये तुलनीय आंकड़े 20.1%, दक्षिण-पूर्व एशिया के लिये 32% और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र के लिये 7.6% थे। हालांकि, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र ने इसी अवधि में 14.8% की वृद्धि दर्शाई.
सारणी 2 उन चार प्रमुख देशों में कुष्ठरोग की स्थिति दर्शाती है, जो अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर निर्मूलन लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके हैं। इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिये कि: क) निर्मूलन को प्रति 10.000 जनसंख्या में 1 से कम मामलों के प्रसार के रूप में परिभाषित किया जाता है; ख) मेडागास्कर ने सितंबर 2006 में राष्ट्रीय स्तर पर निर्मूलन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया; ग) नेपाल में पहचाने गए मामलों की संख्या मध्य-नवंबर 2004 से मध्य-नवंबर 2005 की जानकारी पर आधारित है; और घ) डी. आर. कांगो D.R. Congo ने 2008 में आधिकारिक रूप से डब्ल्यूएचओ WHO को यह जानकारी दी कि राष्ट्रीय स्तर पर उसने 2007 के अंत में निर्मूलन का लक्ष्य हासिल कर लिया था।

7.4. महामारी विज्ञान चीन के जनवादी गणतंत्र में वर्तमान स्थिति
चीन के जनवादी गणतंत्र पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना में कुष्ठरोग से उबर चुके ऐसे अनेक मरीज हैं, जिन्हें शेष समाज से पृथक कर दिया गया था। 1950 के दशक में चीन की साम्यवादी सरकार ने इस बीमारी से उबर चुके लोगों के लिये दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में "उबर चुके ग्रामों रिकवर्ड विलेज्स" की स्थापना की. हालांकि बहु-औषधि उपचार के आगमन साथ ही अब कुष्ठरोग का इलाज संभव है, लेकिन ये ग्रामीण वहीं बसे हुए हैं क्योंकि बाहरी विश्व द्वारा उन पर इस बीमारी का कलंक लगा दिया गया है। चीन में जॉय इन एक्शन Joy in Action जैसे स्वास्थ्य एनजीओ NGO उभरे हैं, जो विशेष रूप से इन" उबर चुके ग्रामों” की स्थिति सुधारने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

8.1. इतिहास शब्द व्युत्पत्ति
कुष्ठरोग के लिये अंग्रेजी भाषा में प्रयुक्त लेप्रसी Leprosy शब्द प्राचीन ग्रीक भाषा के शब्द λέπρα

8.2. इतिहास कारणात्मक जीव की पहचान
17वीं सदी की समाप्ति के बाद, पश्चिमी यूरोप में केवल नॉर्वे और आइसलैंड ही ऐसे देश थे, जिनमें कुष्ठरोग के गंभीर समस्या थी। 1830 के दशक के दौरान, नॉर्वे में कुष्ठरोगियों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हुई, जिससे इस स्थिति के संबंध में चिकित्सीय शोध भी बढ़ा और यह बीमारी एक राजनैतिक मुद्दा बन गई। 1854 में नॉर्वे ने कुष्ठरोग के लिये एक चिकित्सीय अधीक्षक की नियुक्ति की और 1856 में कुष्ठरोगियों के लिये एक राष्ट्रीय रजिस्टर की स्थापना की, जो कि पूरे विश्व में मरीजों का पहला राष्ट्रीय रजिस्टर था।
1873 में, जी. एच. आर्मर हैन्सेन G. H. Armauer Hansen द्वारा नॉर्वे में कुष्ठरोग के कारणात्मक एजेंट, माइकोबैक्टेरियम लेप्री Mycobacterium leprae, की खोज की गई, जिससे यह मनुष्यों में इस बीमारी का कारण बनने वाला पहला ज्ञात जीवाणु बन गया।
हैन्सेन ने दाग़रहित ऊतकों वाले अनेक क्षेत्रों से अनेक छोटे गैर-अपवर्तक दण्डाणुओं का अवलोकन किया। ये दण्डाणु पोटेशियम के जल में घुलनशील नहीं थे और वे अम्ल तथा अल्कोहल के प्रति तीव्र थे। 1879 में वे ज़िएल की विधि के द्वारा इन जीवों को चिह्नित करने में सक्षम हुए और कोच के दण्डाणु माइटोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस Mycobacterium tuberculosis के साथ इसकी समानता का उल्लेख भी किया गया। इन जीवों में तीन उल्लेखनीय अंतर थे: 1 कुष्ठरोग के घावों में उपस्थित दण्डाणुओं की संख्या अत्यधिक थी 2 उन्होंने अंतर्कोशिकीय संग्रहणों ग्लॉबी की रचना की, जो कि उनकी एक विशेषता है और 3 इन दण्डाणुओं में शाखाओं और सूजन के साथ अनेक प्रकार के आकार थे। इन अंतरों ने यह सुझाव दिया कि कुष्ठरोग किसी ऐसे जीव के कारण उत्पन्न होता था, जो माइकोबैक्टेरियम ट्युबरक्युलॉसिस Mycobacterium tuberculosis से संबंधित तो था, लेकिन उससे भिन्न था।
उन्होंने बर्गेन Bergen में सेंट जॉर्जेन्स अस्पताल St. Jørgens Hospital मे कार्य किया, जिसके स्थापना पंद्रहवीं सदी के प्रारंभ में हुई थी। आज सेंट जॉर्जेन एक संग्रहालय, लेप्राम्युसीट Lepramuseet है, जो संभवतः उत्तरी यूरोप में सर्वश्रेष्ठ रूप से संरक्षित कुष्ठरोग चिकित्सालय है।

9. देशों के अनुसार कुष्ठरोग
मुस्लिम विश्व
मुस्लिम विश्व में, फारसी बहुश्रुत एविसेना Avicenna सी. c. 980–1037) कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों में अनुनासिक पट के विनाश का वर्णन करने वाला चीन के बाहर का पहला ग्रंथ था।
ग्रीस
2009 में ग्रीस से दो देशज मामलों की जानकारी मिली थी।
ग्रेट ब्रिटेन
ग्रेट ब्रिटेन में अंतिम ज्ञात मामला 1901 में शेटलैंड द्वीप Shetland Islands में मिला था।

9.1. देशों के अनुसार कुष्ठरोग रोम
पश्चिम में, कुष्ठरोग का सबसे प्राचीन ज्ञात विवरण रोमन विश्वकोश के रचयिता ऑलस कॉर्नेलियस सेल्सस Aulus Cornelius Celsus 25 ईसा पूर्व से – 37 ईस्वी ने अपनी डी मेडिसिना De Medicina में दिया; उन्होंने कुष्ठरोग को" श्लीपद elephantiasis ” कहा. रोमन लेखक प्लाइनी द एल्डर Pliny the Elder 23–79 ईस्वी ने भी इसी बीमारी का उल्लेख किया। हालांकि, 5वीं सदी ईस्वी के वल्गेट Vulgate में लेविटिकस के" सारा’ट ” sarat of Leviticus पुराना करार का अनुवाद" लेप्रा lepra ” के रूप में किया गया है, लेकिन सारा’ट sara’t का लेवाइटिकस Leviticus में मिलने वाला मूल रूप सेल्सस Celsus व प्लाइनी Pliny द्वारा वर्णित श्लीपद elephantiasis नहीं था; वस्तुतः सारा’ट sarat का प्रयोग एक ऐसी बीमारी का वर्णन करने के लिये किया जाता था, जो घरों और वस्रों को प्रभावित कर सकती थी। कैटरीना सी. डी. मैक्लॉयड Katrina C. D. McLeod और रॉबिन डी. एस. येट्स Robin D. S. Yates के अनुसार सारा’ट sarat "रस्मी अशुद्धि की एक स्थिति या त्वचा के रोग के एक अस्थायी रूप का द्योतक है।"

9.2. देशों के अनुसार कुष्ठरोग मुस्लिम विश्व
मुस्लिम विश्व में, फारसी बहुश्रुत एविसेना Avicenna सी. c. 980–1037) कुष्ठरोग से ग्रस्त लोगों में अनुनासिक पट के विनाश का वर्णन करने वाला चीन के बाहर का पहला ग्रंथ था।

9.3. देशों के अनुसार कुष्ठरोग मध्य-युग
मध्य-युग में विभिन्न लेप्रोसारिया leprosaria, या कुष्ठरोग चिकित्सालय, उभर आए; मैथ्यू पेरिस Matthew Paris, एक बेनेडिक्ट-अनुयायी संन्यासी Benedictine Monk, का आकलन है कि तेरहवीं सदी के प्रारंभिक काल में पूरे यूरोप में इनकी संख्या 19.000 थी। पहली दर्ज की गई कुष्ठरोग कॉलोनी हार्ब्लेडाउन Harbledown में थी। ये संस्थाएं आश्रमों की तर्ज पर चलाई जातीं थीं और हालांकि कुष्ठरोगियों को इन आश्रम-जैसे स्थानों पर रहने के लिये प्रोत्साहित किया जाता था, लेकिन ऐसा उनके स्वयं के स्वास्थ्य व संगरोध के लिये था। वस्तुतः कुछ मध्ययुगीन स्रोत इस विश्वास की ओर संकेत करते हैं कि जो लोग कुष्ठरोग से ग्रस्त थे, उनके बारे में यह माना जाता था कि वे इस धरती पर ही पापशोधन की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे और इसी कारण उनके कष्टों को सामान्य व्यक्ति के कष्टों से अधिक पवित्र माना जाता था। अधिक आमतौर पर, कुष्ठरोगियों को जीवन और मृत्यु के बीच के एक स्थान पर निवास करने वालों के रूप में देखा जाता था: वे अभी भी जीवित थे, लेकिन फिर भी उनमें से अधिकांश ने सांसारिक अस्तित्व से या तो स्वयं ही खुद को रस्मी रूप से अलग कर लिया था या फिर उन्हें ऐसा करने पर बाध्य किया गया था। सेंट लाज़ारस Saint Lazarus की परंपरा एक सन्यासियों की एक अस्पताल संचालित करने वाली और सैन्य संचालन वाली परंपरा थी, जिसकी शुरुआत बारहवीं सदी में येरुशलम में हुई और अपने पूरे इतिहास के दौरान यह कुष्ठरोग से जुड़ी रही. इस परंपरा के पहले संन्यासी कुष्ठरोग के योद्धा थे और मूल रूप से उनमें कुष्ठरोग के महागुरू grand masters हुआ करते थे, हालांकि सदियां बीतने के साथ-साथ इस परंपरा के ये पहलू परिवर्तित हो गए।
रैडगुंड Radegund को कुष्ठरोगियों के पैर धोने के लिये जाना जाता है। ऑर्डरिक वाइटेलिस Orderic Vitalis ने एक सन्यासी, राल्फ Ralf के बारे में लिखा है, जो कुष्ठरोगियों के कष्टों को देखकर इतने द्रवित हो गए कि उन्होंने कुष्ठरोग पाने की प्रार्थना की जो कि अंततः उन्होंने प्राप्त भी किया. अपने आगमन की सूचना देने के लिये कुष्ठरोगी अपने साथ एक टुनटुना और घंटी रखा करता था और इसके उद्देश्य लोगों को दान देने के लिये आकर्षित करने के साथ ही इस बात की चेतावनी देना भी था कि एक रोगी व्यक्ति आस-पास ही है।

9.4. देशों के अनुसार कुष्ठरोग भारत
द ऑक्सफोर्ड इलस्ट्रेटेड कम्पेनियन टू मेडिसिन The Oxford Illustrated Companion to Medicine का मत है कि कुष्ठरोग का उल्लेख और साथ ही इसका उपचार, हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक अथर्व-वेद में पहले से ही वर्णित है। एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटानिका 2008 Encyclopedia Britannica 2008 में लिखते हुए, कीर्न्स Kearns व नैश Nash कहते हैं कि कुष्ठरोग का प्रथम उल्लेख भारतीय चिकित्सा पुस्तक सुश्रुत संहिता 6वीं सदी ईसा पूर्व में मिलता है। द कैम्ब्रिज एन्साइक्लोपीडिया ऑफ ह्युमन पैलियोपैथोलॉजी The Cambridge Encyclopedia of Human Paleopathology 1998 के अनुसार: "भारत की सुश्रुत संहिता 600 सदी ईसा पूर्व से ही इस स्थिति का काफी अच्छी तरह वर्णन करती है और यहां तक कि इसके लिये उपचारात्मक सुझाव भी प्रदान करती है". शल्य-चिकित्सक सुश्रुत 6वीं सदी ईसा पूर्व में भारत के नगर काशी में निवास करते थे, और चिकित्सीय पुस्तक सुश्रुत संहिता - उन्हें समर्पित - ने ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दी के दौरान अपनी उपस्थिति दर्ज की. सुश्रुत के कार्य का उत्खनन में प्राप्त सबसे प्राचीन सुरक्षित लिखित सामग्री बोवर पाण्डुलिपी - चौथी सदी ईस्वी में लिखित, है, जो कि मूल रचना के लगभग एक सहस्राब्दी बाद लिखी गई। इन प्राचीन कार्यों की उपस्थिति के बावजूद इस बीमारी का पहला सामान्यतः अचूक माना जाना वाला वर्णन 150 ईस्वी में गैलेन ऑफ पेरागमम Galen of Pergamum का था।
2009 में, भारत में 4000-वर्षों पुराना एक नर-कंकाल मिला, जिस पर कुष्ठरोग के चिह्न दिखाई दे रहे थे। यह खोज बालाथाल Balathal नामक स्थान पर हुई, जो कि वर्तमान में राजस्थान का एक भाग है और ऐसा माना जाता है कि यह इस बीमारी का अभी तक प्राप्त सबसे पुराना मामला है। इससे इस बीमारी के पिछले सबसे प्राचीन ज्ञात मामले की तिथि, जो कि छठी-सदी के मिस्र की थी, 1.500 वर्ष पीछे चली गई। ऐसा विश्वास है कि खुदाई में मिला नर-कंकाल किसी पुरुष का है, जो अपनी आयु के तीसरे दशक में था और अहार कैल्कोलिथिक Ahar Chalcolithic संस्कृति का सदस्य था। पुरातत्वविदों का कथन है कि यह नर-कंकाल न केवल कुष्ठरोग का अब तक प्राप्त सबसे प्राचीन मामला है, बल्कि यह इस प्रकार का पहला उदाहरण भी है, जो कि प्रागैतिहासिक भारत तक पीछे जाता है। यह खोज इस बीमारी के उदगम से संबंधित एक सिद्धांत का समर्थन करती है, जिसका मानना है कि सिकंदर महान की सेनाओं के माध्यम से यूरोप में फैलने से पूर्व इसका उदगम भारत या अफ्रीका में हुआ।
1881 में, भारत में कुष्ठरोग के लगभग 120.000 मरीज थे। केंद्र सरकार ने 1898 का लेपर्स एक्ट Lepers Act of 1898 पारित किया, जिसने भारत में कुष्ठरोग से ग्रस्त व्यक्तियों के बलपूर्वक परिरोध के लिये कानूनी प्रावधान प्रदान किया।

9.5. देशों के अनुसार कुष्ठरोग चीन
प्राचीन चीन के सन्दर्भ में, कैटरीना सी. डी. मैक्लॉइड Katrina C. D. McLeod और रॉबिन डी. एस. येट्स Robin D. S. Yates ने निम्न-प्रतिरोध वाले कुष्ठरोग के लक्षणों के सबसे प्राचीन ज्ञात स्पष्ट वर्णन प्रदान करने वाले के रूप में, 266-246 ईसा पूर्व के स्टेट ऑफ क्विन’स फेंग ज़ेन शी State of Qins Feng zhen shi 封診式 सीलबंदी और पड़ताल के मॉडलों की पहचान की, हालांकि इसे लि li 癘, त्वचा के विकार के लिये एक सामान्य चीनी शब्द, के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया था। 1975 में हुबेई क्षेत्र के शुइहुदी, युनमेंग की खुदाई में प्राप्त बांस की पट्टी पर लिखा तीसरी सदी ईसा पूर्व का यह चीनी अवतरण न केवल" नाक के स्तंभ” के नष्ट होने का, बल्कि" भौहों में सूजन, बालों के झड़ना, अनुनासिक उपास्थि के अवशोषण, घुटनों और कोहनियों में पीड़ा, कठिनाईपूर्ण और बेसुरे श्वसन तथा साथ ही असंवेदनता” का भी वर्णन करती है।

9.6. देशों के अनुसार कुष्ठरोग जापान
जापान में कुष्ठरोग की रोकथाम के लिये 1907, 1931 और 1953 में बनागए नियमों के आधापर आरोग्य-निवास में मरीजों के पृथक्करण का एक अद्वितीय इतिहास रहा है और इस कारण इसने कुष्ठरोग के कलंक को और गहरा कर दिया है। 1953 के कानून को 1996 में निरस्त कर दिया गया। 2008 तक प्राप्ति जानकारी के अनुसार अभी भी 13 राष्ट्रीय आरोग्य-निवासों और 2 निजी चिकित्सालयों में 2717 पूर्व-मरीज रह रहे हैं। वर्ष 833 में लिखित एक दस्तावेज में, कुष्ठरोग का वर्णन इस प्रकार किया गया है:" शरीर के पांच अंगों को खा लेने वाले एक परजीवी के कारण होने वाली एक बीमारी. इसमें भौहें और पलकें निकलकर अलग हो जाती हैं और नाक का आकार विकृत हो जाता है। यह बीमारी स्वर में कर्कशता उत्पन्न करती है और आवश्यक रूप से इसमें अंगुलियों और पंजों के शामिल होते हैं। इसके मरीजों के साथ न सोएं क्योंकि यह बीमारी आस-पास के लोगों तक भी फैल सकती है।" यह संक्रामकता के प्रति चिंता व्यक्त करनेवाला पहला दस्तावेज था।

9.7. देशों के अनुसार कुष्ठरोग पुर्तगाल
1947 में, पुर्तगाल में हॉस्पिटल-कॉलोनिया रोविस्को पैस Hospital-Colónia Rovisco Pais रोविस्को पैस अस्पताल-कॉलोनी की स्थापना कुष्ठरोग के उपचार के लिये एक राष्ट्रीय केंद्र के रूप में की गई। 2007 में इस नाम बदलकर सेंट्रो डी मेडिसिना डी रिएबिलिटाकाओ डा रेजिआओ सेंट्रो-रोविस्को पैस Centro de Medicina de Reabilitação da Região Centro-Rovisco Pais कर दिया गया। यह अभी भी एक कुष्ठरोग सेवा प्रदान करता है, जिसमें 25 पूर्व-मरीज रहते हैं। 1988 और 2003 के बीच पुर्तगाल में कुष्ठरोग के 102 मरीजों का उपचार किया गया।

9.8. देशों के अनुसार कुष्ठरोग स्पेन
स्पेन में द सैनेटोरियो डी फॉन्टिलेस The Sanatorio de Fontilles फॉन्टिलेस आरोग्य-निवास की स्थापना 1902 में की गई और 1909 में इसमें पहला मरीज भर्ती हुआ। 2002 में इस सैनेटोरियो Sanatorio में आरोग्य निवास में 68 निवासी मरीज थे और 150 अधिक बाहरी मरीज उपचार प्राप्त कर रहे थे। बहुत थोड़ी संख्या में अभी भी मामलों की जानकारी मिलती रहती है।

9.9. देशों के अनुसार कुष्ठरोग जर्मनी
सन 1700 तक यूरोप के अधिकांश भाग से कुष्ठरोग को लगभग मिटा दिया गया था, लेकिसन 1850 के कुछ समय बाद रूसी साम्राज्य से आने वाले लिथुआनियाई आप्रवासियों कर्मियों के माध्यम से पूर्वी प्रुशिया में कुष्ठरोग का पुनः आगमन हुआ। 1800 में मेमेल Memel अब लिथुआनिया Lithuania में क्लाइपेडा Klaipėda में पहले कुष्ठरोग आरोग्य-निवास leprosarium की स्थापना की गई। 1900 और 1904 में ऐसे विधेयक पारित किये गये, जिन्होंने मरीजों का पृथक्करण करना और उन्हें दूसरों के साथ कार्य करने की अनुमति न देना आवश्यक बना दिया.

9.10. देशों के अनुसार कुष्ठरोग ग्रेट ब्रिटेन
ग्रेट ब्रिटेन में अंतिम ज्ञात मामला 1901 में शेटलैंड द्वीप Shetland Islands में मिला था।

9.11. देशों के अनुसार कुष्ठरोग माल्टा
माल्टा में कुष्ठरोग अर्गा कॉर्पोर मॉर्बी लेप्री erga corpore morbi leprae का पहला लेखबद्ध मामला 1492 में एक गोज़िटन महिला गैरिता ज़ेज्बैस Garita Xejbais) का था, लेकिन यह निश्चित है कि यह बीमारी इस समय से पूर्व भी इस द्वीप पर मौजूद थी। अगला दर्ज मामला 1630 में डोमिनिक के एक तपस्वी का था। वर्ष 1687 की एक रिपोर्ट में पांच मामले दर्ज थे। इसके बाद 1808 में तीन मामलों की जानकारी मिली. 1839 और 1858 के बीच सात अतिरिक्त मामले दर्ज किये गए। 1890 में एक जनसंख्या सर्वेक्षण में कुल 69 मामले दर्ज हुए. 1957 में एक सर्वेक्षण के बाद 151 कुष्ठ रोग से संक्रमित लोगों की पहचान की.
जून 1972 में, एक निर्मूलन कार्यक्रम प्रारंभ किया गया। यह परियोजना हैम्बर्ग स्थित बॉर्सल इंस्टीट्यूट Borsal Institute के निदेशक एनो फ्रीर्कसेन Enno Freerksen के कार्य पर आधारित थी। डॉ फ्रीर्कसेन द्वारा इससे पूर्व किये गये परीक्षणों में राइफैपिसिन rifampacin, आइज़ोनियाज़िड izoniazid, डैप्सोन dapsone और प्रोथियोनामाइड prothionamide का प्रयोग किया गया था। माल्टा परियोजना में राइफैम्पिसिन rifampacin, डैप्सोन dapsone और क्लोफैमाज़ाइन clofamazine का प्रयोग हुआ। लगभग 300 मरीजों के उपचार के बाद 1999 में यह परियोजना आधिकारिक रूप से बंद कर दी गई।

9.12. देशों के अनुसार कुष्ठरोग रोमानिया
यूरोप में कुष्ठरोग की अंतिम कॉलोनी रोमानिया के टिचिलेस्टी Tichileşti में थी। 1991 तक, मरीजों को कॉलोनी छोड़ने की अनुमति नहीं दी जाती थी। इस कॉलोनी में मरीजों को भोजन, सोने के लिये एक स्थान, कपड़े और चिकित्सीय सुविधाएं मिलती हैं। कुछ मरीज लंबे मंडपों में और शेष सब्जियों व फलों के उद्यानों से युक्त घरों में रहते हैं। इस कॉलोनी में दो चर्च – ऑर्थोडॉक्स Orthodox तथा बैप्टिस्ट Baptist – एवं एक खेत है, जहाँ कॉलोनी स्वयं के लिये मक्के का उत्पादन करती है।

9.13. देशों के अनुसार कुष्ठरोग कनाडा
19वीं सदी के अंत में अटलांटिक कनाडा में कुष्ठरोग के मामले मिले थे। इसके मरीजों को पहले मिरामिची नदी में शेल्ड्रेक द्वीप पर रखा गया था और बाद में इन्हें को स्थानांतरित कर दिया गया। Tracadie कैथलिक साध्वियां Catholic nuns रिलीजियुसेस हॉस्पिटलीयरेस डी सेन्ट-जोसेफ religieuses hospitalières de Saint-Joseph, आरएचएसजे RHSJ) रोगियों की देखभाल के लिये आईं. उन्होंने न्यू-ब्रुन्सविक New-Brunswick में फ्रांसीसी भाषा का पहला अस्पताल French-language hospital खोला और इसके बाद अनेक अन्य अस्पताल खुले. आरएचएसजे RHSJ की साध्वियों द्वारा खोले गए अस्पतालों में से अनेक का प्रयोग आज भी किया जाता है। ट्रैकेडि Tracadie में कुष्ठरोगों को रखने वाला अंतिम अस्पताल 19991 में तोड़ दिया गया। इसका कुष्ठरोग व संक्रामक रोगों के रोगियों के लिये निर्मित भाग lazaretto section 1965 से ही बंद कर दिया गया था। अपने अस्तित्व की एक सदी की अवधि में इसने न केवल बीमारी के एकाडियन Acadian पीड़ितों को बल्कि पूरे कनाडा से आने वाले लोगों तथा साथ ही आइसलैंड, रूस और चीन सहित अन्य देशों से आने वाले बीमार आप्रवासियों को भी शरण दी.

9.14. देशों के अनुसार कुष्ठरोग संयुक्त राज्य अमरीका
प्रतिवर्ष 150-200 के बीच नए मामलों का निदान होता है। 1999 में 108 मामलों की जानकारी प्राप्त हुई. कुष्ठरोग सबसे ज्यादा मात्रा में टेक्सास और लुइज़ियाना में मिलता है, जिसका कारण शायद इन राज्यों में नौ धारियों वाले वर्मी की उपस्थिति है।

9.15. देशों के अनुसार कुष्ठरोग हवाई द्वीप-समूह
इस द्वीप पर कुष्ठरोग की शुरुआत की तिथि को लेकर विवाद है। सबसे आम तौपर माना जाने वाला दृष्टिकोण यह है कि इसका आगमन 1850 के दशक के मध्य में आए चीनी आप्रवासियों के द्वारा हुआ, लेकिन कुछ ऐतिहासिक रिकॉर्ड सुझाव देते हैं कि यह बीमारी उससे भी पूर्व समुद्री-नाविकों के माध्यम से आई होगी.

10.1. समाज और संस्कृति कुष्ठरोग से ग्रस्त प्रसिद्ध हस्तियां
बाइबिल-संबंधी लेखनों में ऐसे अनेक सन्दर्भ उपस्थित हैं, जैसे मूसा की बहन, हालांकि इनमें उल्लेखित पीड़ाओं और वर्णित लक्षणों को अब हैन्सेन के रोग के लक्षण या केवल इसी रोग के लक्षण नहीं माना जाता इससे संबंधित चर्चा को ‘ज़ार्थ Tzaraath’ में देखें)
सेंट डैमियन, एक रोमन कैथलिक मिशनरी-पादरी, को मोलोकाई Molokai स्थित कुष्ठरोगियों की कॉलोनी में सेवा देते समय कुष्ठरोग का संक्रमण हो गया था, लेकिन उन्होंने तब तक कुष्ठरोगियों की सेवा जारी रखी, जब तक कि इस बीमारी के कारण उनकी स्वयं की मृत्यु नहीं हो गई। 11 अक्टूबर 2009 को वैटिकन में आयोजित एक समारोह में उन्हें संत की उपाधि से विभूषित किया गया और इसकी अध्यक्षता बेनेडिक्ट सोलहवें Benedict XVI ने की
एक जापानी डैम्यो daimyo ओटानी योशित्सुगु Otani Yoshitsugu
संभवतः रॉबर्ट द ब्रुस Robert the Bruce नहीं, हालांकि एक अंग्रेज स्रोत के अनुसार वे इस बीमारी से ग्रसित थे। 1995 में मेल गिब्सन Mel Gibson की फिल्म ब्रेवहार्ट Braveheart में, रॉबर्ट द ब्रुस Robert the Bruce के पिता – रॉबर्ट डी ब्रुस Robert de Brus, एनांडेल के छठे लॉर्ड 6th Lord of Annandale – को कुष्ठरोग से ग्रस्त दर्शाया गया है।
वियतनामी कवि हैन मैक टु Han Mac Tu
बाल्डविन चतुर्थ Baldwin IV, जो कि लैटिन येरुशलम के एक राजा थे और जिनका चित्रण फिल्म किंगडम ऑफ हेवन Kingdom of Heaven के एक पात्र के रूप में किया गया था

10.2. समाज और संस्कृति काल्पनिक कुष्ठरोगी
द आइलैंड The Island विक्टोरिया हिस्लॉप Victoria Hislop द्वारा लिखित एक ऐतिहासिक उपन्यास है, जो अधिकांशतः भूमध्यसागर में स्थित स्पिनालोंगा Spinalonga द्वीप की एक कुष्ठरोग कॉलोनी पर आधारित है
द सिम्पसन्स The Simpsons के भाग" लिटिल बिग मॉम Little Big Mom" में, लिसा Lisa बार्ट Bart और होमर Homer को यह विश्वास दिलाकर मूर्ख बनाती है कि उन्हें कुष्ठरोग है। नेड फ्लैंडर्स Ned Flanders उन्हें उपचार के लिये मोलोकाई Molokai द्वीप भेज देते हैं।
तमिल फिल्म राथा कन्नीर Ratha Kanneer ரத்தகண்ணீர் में, पात्र मोहन Mohan एम. आर. राधा M. R. Radha कुष्ठरोगी हो जाता है, जिसे इस बीमारी के माध्यम से जीवन की अच्छाई और मूल्यों का पता चलता है
गेल त्सुकियामा Gail Tsukiyama द्वारा लिखित द समुराई’स गार्डन The Samurais Garden में, साची Sachi का पात्र कुष्ठरोग से ग्रस्त है और कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी में रहता है।
शेरलॉक होम्स Sherlock Holmes की लघु कथा "द एडवेंचर ऑफ द ब्लैंचेड सोल्जर The Adventure of the Blanched Soldier" एक सैनिक से संबंधित है, जिसे कुष्ठरोग से ग्रस्त माना जाता है, लेकिन बाद में पता चलता है कि वास्तविक समस्या इचथायॉसिस ichthyosis है।
कुष्ठरोग के बारे में एक मज़ेदार लेकिन शिक्षाप्रद कार्यक्रम 2006 में प्रदर्शित भाग मि. मॉन्क एंड द लेपर Mr. Monk and the Leper में दर्शाया गया है।
2006 में बीबीसी BBC के रॉबिन हुड Robin Hood संस्करण में, मुख्य-स्थायी खलनायकों गाय Guy और इसाबेला Isabella के पिता, रॉजर ऑफ गिस्बॉर्न Roger of Gisborne का चरित्र, कुष्ठरोग से ग्रस्त हो जाता है और इस प्रकार इस बीमारी से ग्रस्त होने के कारण उसे रस्मी रूप से मृत, फिर निर्वासित, करार दे दिया जाता है।
द क्रोनिकल्स ऑफ थॉमस कोवेनन्ट The Chronicles of Thomas Covenant का नायक, अनबिलिवर Unbeliever, कुष्ठरोग से पीड़ित था, जो कि इस पूरी श्रृंखला का केंद्रीय बिंदु है।
ग्राहम ग्रीन Graham Greene का उपन्यास अ बर्न्ट-आउट केस A Burnt-Out Case एक अफ्रीकी कुष्ठरोग कॉलोनी पर आधारित है।
1973 की फिल्म पैपिलोन Papillon में, स्टीव मैकक्वीन Steve McQueen डेविल्स आइलैंड Devils Island के एक कैदी का किरदार निभाते हैं, जिसका फरार होने के प्रयास में कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी से सामना होता है।
शुसाकु एंडो Shusaku Endo की वताशी गा सुतेता ओना Watashi ga suteta onna वह लड़की जिसे मैंने पीछे छोड़ दिया 1963 में, एक युवा पुरुष और एक मासूम युवा महिला के साथ उसके बेमेलपन की कहानी है, जिसे गलती से कुष्ठरोग से ग्रस्त बता दिया जाता है, लेकिन फिर भी वह कुष्ठरोग आरोग्य-निवास में मरीजों की सहायता के लिये बने रहने और कार्य करने का विकल्प चुनती है
बोडी Bodie और ब्रोक थोएने Brock Thoene की पुस्तक सेकंड टच Second Touch की कथा नाज़रथ के येशुआ Yeshua of Nazareth के काल के दौरान मैक’ऑब की घाटी Valley of Mak’ob में बसी कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी पर आधारित है।
शेक्सपीयर Shakespeare के हैम्लेट में, प्राचीन राजा हैम्लेट, राजकुमार हैम्लेट के पिता, का भूत, एक ‘लेप्रस डिस्टिलमेंट leprous distilment’ के द्वारा ज़हर दिये जाने का दावा करता है क्योंकि उसमें निर्विवाद उबाल जैसे कुष्ठरोग के लक्षणों में से अनेक लक्षण दिखाई देते हैं।
मूल पुस्तक बेन हर Ben Hur तथा इस पुस्तक पर आधारित फिल्मों में, जुडाह बेन-हर Judah Ben-Hur, नायक, की मां और बहन जेल में रहने के दौरान कुष्ठरोग से संक्रमित हो जाती हैं।
स्टीव थेयर Steve Thayer द्वारा लिखित पुस्तक द लेपर The Leper का नायक एक अमरीकी सैनिक है, जो प्रथम विश्व-युद्ध World War I के दौरान संक्रमित हो जाता है और इस बीमारी को ग्रहण कर लेता है
फिल्म "प्रिंसेज़ मोनोनोक Princess Mononoke" में, मुख्य पात्रों में से एक, लेडी एबोशी ऑफ आयरन टाउन Lady Eboshi of Iron Town कुछ कुष्ठरोगियों की देखभाल करती है, जिन्होंने उसके लिये हथियार बनाए थे।
बोडी Bodie और ब्रोक थोएने Brock Thoene द्वारा लिखित एक अन्य पुस्तक, इलेवन्थ गेस्ट Eleventh Guest, नाज़रथ के येशुआ Yeshua of Nazareth से उपचार प्राप्त करने की इच्छा रखने वाले कुष्ठरोगियों के जीवन पर केंद्रित है।
ग्रेगरी डेविड रॉबर्ट्स Gregory David Roberts द्वारा लिखित उपन्यास शांताराम Shantaram में, मुख्य पात्र, लिन Lin, का सामना मुंबई की एक झुग्गी-बस्ती में रहने के दौरान अक्सर कुष्ठरोगियों की एक कॉलोनी के सदस्यों से होता है।
"मॉन्टी पायथन Monty Python" रेखाचित्र "कॉन्क्विस्टेडर कॉफी कैम्पेन Conquistador Coffee Campaign" में, एक कॉफी कम्पनी के विज्ञापन-दाता से उसके बॉस द्वारा इंस्टेंट कॉफी instant coffee के लिये बने एक विज्ञापन को उसके द्वारा "इंस्टेंट लेप्रसी instant leprosy" में, तथा साथ ही कुछ अन्य अनाकर्षक विज्ञापनों में बदलने के बारे में पूछा जाता है।