Топ-100 ⓘ मुक्त ज्ञानकोश. क्या आप जानते हैं? पृष्ठ 131

ⓘ मुक्त ज्ञानकोश. क्या आप जानते हैं? पृष्ठ 131



                                               

अद्वैताचार्य महाराज

अद्वैताचार्य महाराज चैतन्य महाप्रभु के प्रथम शिष्य थे। इन्हीं के साथ नित्यानंद प्रभु भी महाप्रभु के आरंभिक शिष्यों में से एक थे। इन दोनों ने निमाई के भक्ति आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की। निमाई ने अपने इन दोनों शिष्यों के सहयोग से ढोलक, मृदंग, झाँ ...

                                               

रघुनाथ दास गोस्वामी

श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षण्गोस्वामी में से एक थे। इन्होंने युवा आयु में ही गृहस्थी का त्याग किया और गौरांग के साथ हो लिए थे। ये चैतन्य के सचिव स्वरूप दामोदर के निजी सहायक रहे। उनके संग ही इन्होंने ग ...

                                               

रघुनाथ भट्ट गोस्वामी

श्री रघुनाथ भट्ट गोस्वामी, वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षण्गोस्वामी में से एक थे। ये सदा हरे कृष्ण का अन्वरत जाप करते रहते थे और श्रीमद भागवत का पाठ नियम से करते थे। राधा कुण्ड के तट पर निवास करते हुए, प्रतिदिन भागवत का मीठा पाठ ...

                                               

राधा दामोदर मंदिर

प्राचीन श्रीराधा दामोदर मंदिर वृंदावन में स्थित है। इसकी चार परिक्रमाएँ करने से गिरिराज गोवर्धन की परिक्रमा का फल मिलता है। साढ़े चार सौ वर्ष पुराने इस मंदिर की परिक्रमा करने से उसमें विराजमान गिरिराज शिला की स्वतः परिक्रमा हो जाती है। इसकी एक कि ...

                                               

राधा रमण मंदिर

                                               

राधा वल्लभ मंदिर

राधावल्लभ मन्दिर, वृन्दावन में स्थित श्री राधावल्ल्भलाल का प्राचीन मन्दिर है। यह मन्दिर श्री हरिवंश महाप्रभु ने स्थापित किया था। वृंदावन के मंदिरों में से एक मात्र श्री राधा वल्लभ मंदिर में नित्य रात्रि को अति सुंदर मधुर समाज गान की परंपरा शुरू स ...

                                               

रामानन्द राय

रामानंद राय उड़ीसा के राजा गजपति प्रतापरुद्रदेव के अधीनस्थ विद्यानगर के शासक थे। यह भक्त, सुकवि, विरक्त तथा कृष्ण तत्व के विशिष्ट ज्ञाता थे। इनके पिता का नाम भवानंद राय था तथा जन्म संभवत: कटक के पास सं. १५२० के लगभग हुआ था। दक्षिण यात्रा को जाते ...

                                               

रूप गोस्वामी

श्री रूप गोस्वामी, वृंदावन में चैतन्य महाप्रभु द्वारा भेजे गए छः षण्गोस्वामी में से एक थे। वे कवि, गुरु और दार्शनिक थे। वे सनातन गोस्वामी के भाई थे। इनका जन्म १४९३ ई तदनुसार १४१५ शक.सं. को हुआ था। इन्होंने २२ वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम त्याग कर ...

                                               

शिक्षाष्टक

चैतन्य महाप्रभु ने संस्कृत में आठ श्लोकों की रचना की जिन्हें शिक्षाष्टक कहा जाता है। इनमें से एक श्लोक में वे कहते हैं:- "भगवान श्री कृष्ण के पावन नाम और गुणों का संकीर्तन सर्वोपरि है, उसकी तुलना में और कोई साधन नहीं ठहर सकता है।" इन आठ श्लोकों म ...

                                               

श्यामानन्द

श्यामानंद कृष्णभक्त सन्त थे। इनका जन्म चैत्र शु. १५, सं. १५९० को उड़ीसा के धारेंदा ग्राम में हुआ। पिता का नाम कृष्णमंडल तथा माता का दूरिका दासी था। जन्म के अनंतर यह सुवर्णरेखा नदी के तटस्थ अंबुया ग्राम में आ बसे। यहीं इन्होंने शिक्षा प्राप्त की। ...

                                               

षड्गोस्वामी

षड्गोस्वामी से आशय छः गोस्वामियों से है जो वैष्णव भक्त, कवि एवं धर्मप्रचारक थे। इनका कार्यकाल १५वीं तथा १६वीं शताब्दी था। वृन्दावन उनका कार्यकेन्द्र था। चैतन्य महाप्रभु ने जिस गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय की आधारशिला रखी गई थी, उसके संपोषण में उनके षण ...

                                               

सार्वभौम भट्टाचार्य

पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य ने गौरांक की शत-श्लोकी स्तुति रची जिसे आज चैतन्य शतक नाम से जाना जाता है। सन्यास लेने के बाद जब गौरांग पहली बार जगन्नाथ मंदिर पहुंचे, तब भगवान की मूर्ति देखाकर ये इतने भाव-विभोर हो गए, कि उन्मत्त होकर नृत्य करने लगे, व म ...

                                               

स्वरूप दामोदर

स्वरूप दामोदर गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु के सहाध्यायी और परम मित्र थे। इनके पिता पद्मगर्भाचार्य थे। इनका जन्म नवद्वीप में सं. 1541 में हुआ और नाम पुरुषोत्तम रखा गया। यही संन्यास लेने पर स्वरूप दामोदर नाम से विख्यात हुए। यह श्रीगौरांग के सहाध्यायी त ...

                                               

बाउल नर्तक

                                               

आर्य समाज

आर्य समाज एक हिन्दू सुधार आंदोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानन्द सरस्वती ने १८७५ में बंबई में मथुरा के स्वामी विरजानंद की प्रेरणा से की थी। यह आंदोलन पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार के लिए प्रारंभ हुआ था। आर्य समाज म ...

                                               

थियिसोफिकल सोसाइटी

थियोसॉफिकल सोसाइटी एक अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक संस्था है। थियोसोफी ग्रीक भाषा के दो शब्दों "थियोस" तथा "सोफिया" से मिलकर बना है जिसका अर्थ हिंदू धर्म की "ब्रह्मविद्या", ईसाई धर्म के नोस्टिसिज्म अथवा इस्लाम धर्म के "सूफीज्म" के समकक्ष किया जा सकत ...

                                               

प्रार्थना समाज

प्रार्थना समाज भारतीय नवजागरण के दौर में धार्मिक और सामाजिक सुधारों के लिए स्थापित समुदाय है। इसकी स्थापना आत्माराम पांडुरंग तथा महादेव गोविन्द रानाडे ने बंबई में 31 मार्च 1867 को की।

                                               

यंग बंगाल आंदोलन

यंग बंगाल, बंगाल के क्रांतिकारी बंगाली स्वतंत्र चिन्तकों का एक समूह था जो कोलकाता के हिन्दू कॉलेज से सम्बन्धित थे। ये सभी हिन्दू कॉलेज के क्रांतिकारी शिक्षक हेनरी लुई विवियन डिरोजिओ के अनुयायी थे। डिरोजियो हिन्दू कालेज में १८२६ से १८३१ तक पदस्थ थ ...

                                               

बौद्ध ग्रंथ

                                               

अनन्त निर्देश सूत्र

अनन्त निर्देश सूत्र बौद्ध धर्म के महायान सम्प्रदाय का धर्मग्रन्थ है। परम्परा के अनुसार, धर्मजातयाशस नामक एक भारतीय भिक्षु ने ४८१ ई में इसका संस्कृत से चीनी में अनुवाद किया।

                                               

अनुपिटक

                                               

अभिधम्मसमुच्चय

अभिधम्मसमुच्चय एक बौद्ध ग्रन्थ है जिसमें अभिधर्म का सम्पूर्ण तथा युक्तियुक्त संग्रह है। इसकी रचना असंग ने की थी।

                                               

अभिधर्मकोश

आचार्य असंग के छोटे भाई आचार्य वसुबंधु ने अपने जीवन के प्रथम भाग में सर्वास्तिवाद सिद्धांत के अनुसार कारिकाबद्ध अभिधर्मकोश ग्रंथ की रचना की। यह इतना प्रसिद्ध और लोकप्रिय हुआ कि कवि बाण ने लिखा है कि तोते-मैने भी अभिधर्मकोश के श्लोकों का उच्चारण क ...

                                               

अभिसमय

बौद्ध स्थविरवाद के सिद्धांतों का वर्णन अभिधर्म के नाम से प्रसिद्ध है किंतु महायान के शून्यवादी माध्यमिक विकास के साथ ही प्रज्ञापारमिता को महत्व मिला और अधिभर्म के स्थान में अभिसमय शब्द का व्यवहार, विशेषत: मैत्रेयनाथ के बाद होने लगा। मैत्रेयनाथ ने ...

                                               

आगम (बौद्ध)

बौद्ध धर्म में आरम्भिक ग्रन्थों का संग्रह आगम कहलाता है। पाँच आगम सम्मिलित रूप से सुत्तपिटक कहे जाते हैं। थेरावाद सम्प्रदाय में आगम के स्थान पर निकाय शब्द का उपयोग किया जाता है।

                                               

एकोत्तर आगम

एकोत्तर आगम एक प्राचीन बौद्ध संस्कृत ग्रन्थ है जिसका वर्तमान में केवल चीनी अनुवाद ही प्राप्त होता है। एकोत्तर आगम, संस्कृत में रचित सूत्रपिटक के चार आगमों में से एक आगम है।

                                               

कथावत्थु

कथावत्थु स्थविरवादी बौद्ध ग्रन्थ है। यह स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स द्वारा रचित है तथा इसका समय लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है।

                                               

खंधक

थेरवाद संप्रदाय के पालि संस्करण वाले विनय पिटक के तीन भाग हैं- १ सुत्तविभंग महाविभंग भिक्षु संबंधित भिख्खुणीविभंग भिक्षुणी संबंधित २ खंधक ३ परिवार खंधक के दो भाग हैं- १ महावग्ग २ चुल्लवग्ग

                                               

चीनी बौद्ध साहित्य

चीनी बौद्ध साहित्य से आशय बौद्ध धर्म और दर्शन से सम्बन्धित उस साहित्य से है जिसे चीन, जापान और कोरिया के बौद्ध समुदाय में धार्मिक ग्रन्थ की मान्यता प्राप्त है। पारम्परिक रूप से इन्हें चीनी में 大藏經; फीनयिन में Dàzàngjīng; जापानी में 大蔵経 Daiz ...

                                               

त्रिपिटक

त्रिपिटक बौद्ध धर्म का प्रमुख ग्रंथ है जिसे सभी बौद्ध सम्प्रदाय मानते है। यह बौद्ध धर्म के प्राचीनतम ग्रंथ है जिसमें भगवान बुद्ध के उपदेश संग्रहीत है। यह ग्रंथ पालि भाषा में लिखा गया है और विभिन्न भाषाओं में अनुवादित है। इस ग्रंथ में भगवान बुद्ध ...

                                               

दिव्यावदान

दिव्यावदान बौद्ध कथाओं का ग्रंथ है। इन कथाओं में से बहुत सी कथाओं का मूल मूलसर्वास्तिवाद विनय ग्रंथ हैं। महायानी सिद्धांतों पर आश्रित कथानकों का रोचक वर्णन इस लोकप्रिय ग्रंथ का प्रधान उद्देश्य है। इसका ३४वाँ प्रकरण "महायानसूत्र" के नाम से अभिहित ...

                                               

दीपवंस

दीपवंस एक प्राचीन ग्रन्थ है जिसमें श्री लंका का प्राचीनतम इतिहास वर्णित है। दीपवंस, द्वीपवंश का अपभ्रंश है जिसका अर्थ द्वीप का इतिहास है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस ग्रन्थ का संकलन अत्थकथा तथा अन्य स्रोतों से तीसरी-चौथी शताब्दी में किया गया थ ...

                                               

धातुकथा

धताकाथा में मितिका और विभिन्न विषयों दोनों शामिल हैं, ज्यादातर विभांगा से, उन्हें 5 समेकित, 12 आधाऔर 18 तत्वों से संबंधित करते हैं। पहला अध्याय काफी सरल है: "कितने समेकित आदि में अच्छे धाम आदि शामिल हैं?" किताब धीरे-धीरे अधिक जटिल प्रश्नों तक काम ...

                                               

अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता

अष्टसाहस्रिका प्रज्ञापारमिता आठ हजार श्लोकोंवाला यह महायान बौद्ध ग्रंथ प्रज्ञा की पारमिता के माहात्म्य का वर्णन करता है। प्रज्ञापारमिता को मूर्त रूप में अवतरित कर उसके चमत्कार दिखागए हैं। इसमें ३२ परिच्छेद हैं जिनमें प्राय: गृद्धकूट पर्वत पर भगवा ...

                                               

बुद्धचरित

बुद्धचरितम्, संस्कृत का महाकाव्य है। इसके रचयिता अश्वघोष हैं। इसकी रचनाकाल दूसरी शताब्दी है। इसमें गौतम बुद्ध का जीवनचरित वर्णित है। इस महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाधान से तथा इसकी परिणति बुद्धत्व-प्राप्ति में होती है। यह महाकव्य भगवान बुद्ध क ...

                                               

बुद्धवचन

                                               

मणिमेकलई

मणिमेकलई, कवि चितलाई चतनार द्वारा रचित एक महाकाव्य है, जो कि आधुनिक तमिल साहित्य पाँच महाकाव्यों में से एक है। मणिमेकलई तीस छन्दों का काव्य है। यह एक अन्य पाँच महाकाव्यों में एक सिलापतिकाराम की ही उत्तर-कृति है जो कोवालन तथा माधवी की पुत्री की कथ ...

                                               

महावंश

महावंश शाब्दिक अर्थ: महान इतिहास पालि भाषा में लिखी पद्य रचना है। इसमें श्रीलंका के राजाओं का वर्नन है। इसमें कलिंग के राजा विजय ५४३ ईसा पूर्व के श्रीलंका आगमन से लेकर राजा महासेन 334–361 तक की अवधि का वर्णन है। यह सिंहल का प्रसिद्ध ऐतिहासिक महाक ...

                                               

महावस्तु

महावस्तु एक महत्वपूर्ण बौद्ध ग्रंथ है। इसमें भगवान बुद्ध के जीवन को बिन्दु बनाकर छठी शताब्दी ई. पूर्व के इतिहास को प्रस्तुत किया गया है। यह बौद्ध धर्म के ६ ऐसे चुने हुए ग्रंथों में से है जो पालि के स्थान पर संस्कृत में रचे गए। इन ग्रंथों के नाम ह ...

                                               

मूलमध्यमककारिका

                                               

लंकावतारसूत्र

                                               

विमलकीर्तिसूत्र

विमलकीर्तिनिर्देशसूत्र या विमलकीर्तिसूत्र महायान बौद्ध सूत्र ग्रन्थ है। अन्य बातों के अलावा यह ग्रन्थ अद्वैत की शिक्षा देता है। इसके रचयिता विमलकीर्ति हैं।

                                               

विसुद्धिमग्ग

विसुद्धिमग्ग बुद्धघोष द्वारा रचित पालि ग्रंथ है। यह त्रिपिटक के बाद सबसे महत्वपूर्ण थेरवद ग्रंथ माना जाता है। इस ग्रंथ की संरचना रथविनितसूत्त पर आधारित है जिसमें शिष्य की विशुद्धि से आरम्भ करके निब्बान तक की प्रगति का मार्ग सात सोपानों में बताया ...

                                               

समाधिराज सूत्र

समाधिराज सूत्र महायान बौद्धों के माध्यमक सम्प्रदाय का अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसकी रचना २सरी शताब्दी में हुई थी। इसका पूरा नाम सर्वधर्मस्वभाव समताविपंचित समाधिराज सूत्र है। इसे चन्द्रप्रदीप समाधिसूत्र भी कहते हैं। ४५० ई में इसका चीनी भाषा म ...

                                               

सुत्तविभंग

सुत्तविभंग बौद्ध धर्म के थेरवादी मत के ग्रंथ विनय पिटक का एक खंड है। विनय पिटक स्वयं थेरवाद के प्रसिद्ध ग्रंथ त्रिपिटक का हिस्सा है। इस ग्रंथ में बौद्ध समुदाय के नियमों पर टीका है, ग्रंथ की रचना कुछ इस तरीके की है कि प्रत्येक नियम को समझाने से पू ...

                                               

हृदय सूत्र

                                               

त्रिपिटक

                                               

अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदान्त का ग्रन्थ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्और राजा जनक के संवाद का संकलन है। इस पुस्तक के बारे में किंवदंती है कि रामकृष्ण परमहंस ने भी यही पुस्तक नरेंद्र को पढ़ने को कहा था जिसके पश्चात वे उनके शिष्य बने और कालांतर में स्वामी ...

                                               

गणकारिका

गणकारिका पाशुपत दर्शन का एक महत्वपूर्ण मौजूदा ग्रन्थ है। यह एक पुस्तिका है जो पाशुपत दर्शन के गणों के लिये दर्शन के सिद्धांतों और मुख्य विशेषताओं का संक्षेप में वर्णन करता है।

                                               

तीर्थ प्रबन्ध

तीर्थ प्रबन्ध सोलहवीं शती के द्वैत दार्शनिक एवं सन्त श्री वदिराज स्वामी द्वारा संस्कृत में रचित प्रमुख ग्रंथ है। यह ग्रन्थ एक यात्रावर्णन की भांति लिखा गया है जिसमें सम्पूर्ण भारत के तीर्थस्थानों का वर्णन है। इस ग्रन्थ में कुल २३५ श्लोक हैं जो चा ...

शब्दकोश

अनुवाद
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